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Saturday, March 7, 2026

2_भगवान की माया🪔पानी की तलाश या प्रेम का प्रारंभ?

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अब प्रस्तुत है — “भगवान की माया” कथा का भाग 2, जो कथा को और गहराई, रोमांच और भावनात्मकता की ओर ले जाता है।

क्या प्रेम मार्ग से भक्ति छिन जाती है?”
“क्या संसार का सुख, वैराग्य के शिखर से ऊपर है?”
“या यह सब केवल एक स्वप्न है?”

पानी की तलाश या प्रेम का प्रारंभ?

वह एक क्षण… और सब कुछ बदल गया।
नारद जी, जो जल की तलाश में निकले थे, अब अपने उद्देश्य को भूल चुके थे। कुएं पर खड़ी वह युवती उनके मन और बुद्धि पर छा गई थी। उसकी सरलता, उसकी आंखों की भाषा, उसका संयमित सौंदर्य — सब कुछ किसी अनकहे मंत्र की तरह उनके भीतर उतरने लगा।
“नारायण… नारायण…” के उच्चारण अब उनके होंठों पर नहीं रहे। अब वे केवल उस कन्या को ही देख रहे थे। उसे भी यह भान हो गया था कि कोई देवदूत-सा व्यक्ति उसे निहार रहा है। वह जल्दी-जल्दी अपना घड़ा भरकर, अपनी सहेलियों को पीछे छोड़कर घर की ओर लपकी।
लेकिन क्या नारद जी पीछे रह सकते थे?
नहीं। वे भी चल पड़े… उसी ओर… उसी मार्ग पर।
वह कन्या घर के भीतर चली गई, लेकिन नारद जी बाहर द्वार पर खड़े हो गए और पूर्व की भांति “नारायण… नारायण…” का उच्च स्वर लगाने लगे — पर अब उसमें वैराग्य नहीं था, अनुराग था।
गृहस्वामी बाहर आया।
जैसे ही उसने नारद जी को देखा, वह समझ गया कि कोई दिव्य आत्मा उसके द्वार पर आई है। वह श्रद्धा से भर उठा। उसने उन्हें अंदर बुलाया, उनके चरण धोए, स्वच्छ आसन पर बैठाया, आदर से जल पिलाया और भोजन कराया।
तब उसने झुककर पूछा —
“स्वामी, मेरे भाग्य कि आप मेरे द्वार पधारे। कहिए, क्या सेवा करूं?”
नारद जी शांत स्वर में बोले —
“आपकी कन्या… मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ।”
गृहस्वामी चकित रह गया।
एक योगी, एक साधु, एक त्रिलोक भ्रमण करने वाला ब्रह्मचारी — विवाह की बात कर रहा है?
लेकिन वह नारद जी की महिमा जानता था। वह हर्षित भी हुआ — उसकी कन्या को एक महान संत का साथ मिलेगा।
उसने सहर्ष स्वीकृति दे दी।
कुछ ही दिनों में शुभ मुहूर्त पर कन्या का विवाह नारद जी से संपन्न हो गया। गांव में उत्सव का माहौल था। एक दिव्य युगल का मेल, जो संसार और वैराग्य के बीच एक नया सेतु बनने जा रहा था।
विवाह के बाद नारद जी को उसी गांव में एक उपजाऊ भूमि दी गई।
अब नारद, देवर्षि नहीं — एक गृहस्थ किसान बन चुके थे।
🔔 भावना की परतें:
वीणा अब किसी कोने में टंगी थी।
“नारायण… नारायण…” अब गूंजता नहीं था।
हल और कुदाल ने हाथ थाम लिए थे।
प्रेम ने भक्ति को ढक लिया था।
माया ने एक और परदा गिरा दिया था।



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