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Saturday, March 7, 2026

सीमेंट के नाम पर सील हो रहा गांव का भविष्य: मोतिमपुर से उठती एक और सिसकी

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न्यूज लेख | खरोरा, छत्तीसगढ़
बारिश की बूंदों के बीच जब एक गांव अपने अस्तित्व के लिए टेंट लगाकर रात बिताता है, तो समझ लेना चाहिए कि कहीं कुछ बहुत ग़लत हो रहा है।
मोतिमपुर और उसके आसपास के गांवों में इन दिनों केवल आसमान ही नहीं, ज़मीन भी रो रही है — अपने सीने में खुदाई और विस्फोट के डर से।
यहां एक सीमेंट प्लांट और खदान परियोजना को लेकर सिर्फ जनसुनवाई नहीं, बल्कि गांव की आत्मा की सुनवाई हो रही थी। मगर अफ़सोस, शासन-प्रशासन कानों में रुई ठूंसे बैठा था।
सुनवाई से पहले ही शुरू हुआ संघर्ष
जब प्रशासन ने मोतिमपुर में जनसुनवाई की तारीख तय की, तब ग्रामीणों ने तय कर लिया कि वे सिर्फ दर्शक नहीं रहेंगे। वे टेंट लेकर आए, रातभर वहीं डटे रहे। सुबह होते-होते महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग, किसान सब एक स्वर में कहने लगे — “हमें ज़हर नहीं, ज़मीन चाहिए।”
यह विरोध केवल ‘एक प्लांट’ के खिलाफ नहीं है, बल्कि उस सोच के खिलाफ है जो गांवों को सिर्फ संसाधनों का भंडार समझती है और वहां रहने वालों को बाधा।
विकास बनाम विनाश की कहानी
सरकारी फाइलों में इसे ‘विकास परियोजना’ कहा जा रहा है, लेकिन जिनकी ज़मीन, पानी, हवा, पशु, पेड़ और जीवन शैली इस ‘विकास’ से उजड़ जाएगी — उनके लिए यह एक धीमा ज़हर है
1100 एकड़ की खदान, चूना पत्थर की ब्लास्टिंग, गिरता भूजल स्तर, सूखते जल स्रोत, हिलती मकानों की नींव, और 55 हजार लोगों का प्रभावित होना — क्या ये सब सिर्फ ‘प्रगति’ का मूल्य है?
रोजगार नहीं, रोग लाएगा यह प्लांट
ग्रामीणों की चिंता सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं। उन्हें भरोसा नहीं कि ये प्लांट रोजगार देगा। अनुभव कहता है, प्लांट आते हैं, प्रदूषण लाते हैं, फिर मशीनें चलती हैं, गांव खाली होते हैं और बचता है सिर्फ धूल और बीमारी।
क्या कभी किसी नीति-निर्माता ने यह सोचा कि इस प्रकार की परियोजनाएं गांवों के सामाजिक ढांचे को कैसे तोड़ देती हैं?
प्रशासन मौन क्यों है?
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि इस जनसुनवाई का कोई मतलब नहीं था। ना कोई संतोषजनक जवाब मिला, ना कोई पर्यावरणीय रिपोर्ट सार्वजनिक की गई।
तो फिर सवाल है — क्या यह लोकतंत्र है, या फिर औद्योगिक लोभ का नया नक्शा?
एक चेतावनी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
जब कोई ग्रामीण आत्मदाह की चेतावनी देता है, तो उसे ‘अतिरेक’ कह कर टाल देना आसान होता है। लेकिन क्या यह उस गहराई का संकेत नहीं कि उनकी बात कोई सुन ही नहीं रहा?
अब जरूरी है एक निर्णय — इंसान पहले या उद्योग?
मोतिमपुर में जो हो रहा है, वह सिर्फ एक गांव की लड़ाई नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रश्न है —
क्या हम विकास के नाम पर अपने गांव, पर्यावरण और संस्कृति को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं?
यदि सरकारें यह सवाल नहीं पूछेंगी, तो गांव खुद जवाब बन जाएंगे — मोतिमपुर की तरह।

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