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Tuesday, September 29, 2026

एक्सक्लूसिव संवाद: ‘चोर मचाए शोर’ या सत्ता की राजनीतिक मँझधार?

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राजनीतिक चर्चा- 28 सितंबर 2026

(दृश्य: रात का समय, ढलती शाम में एक पुराने चाय के टपरे पर दो राजनीति-मर्मज्ञ बैठे हैं। 55 वर्षीय ज्योतिपति चश्मा ठीक करते हुए चाय की चुस्की ले रहे हैं, तभी 30 वर्षीय युवा पत्रकार/विचारक ज्वाला उनके पास आकर बैठता है।)

ज्वाला: (ज्योतिपति के कान के पास झुककर, रहस्यमयी अंदाज़ में) ज्योतिपति जी! आपने वो पुरानी मशहूर कहावत तो सुनी होगी—”चोर मचाए शोर”?

ज्योतिपति: (अपनी गहरी, तजुर्बेकार नज़र ज्वाला पर टिकाते हुए) ज्वाला! तुम्हारे शब्दों में आज चिंगारी कुछ ज़्यादा ही तेज़ लग रही है। आख़िर तुम्हारी इस सुलगती हुई सुई का इशारा किस तरफ़ है?

ज्वाला: (साफ़ और बेबाक लहज़े में) इशारा साफ़ है ज्योतिपति जी! आज देश में जो राजनीतिक बवंडर चल रहा है, जिस पर गोदी मीडिया केवल ऊपरी तौर पर बरस रहा है, मैं उसके गहरे पानी की बात कर रहा हूँ। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सीधा वार करते हुए यहाँ तक कह दिया कि ‘मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) तो भाजपा के कार्यकर्ता की तरह काम कर रहे हैं।’

ज्योतिपति: (धीमी आवाज़ में) यह आरोप नया नहीं है ज्वाला, लेकिन इसके पीछे की टाइमलाइन को ध्यान से देखो।

ज्वाला: वही तो! गणित देखिए ज्योतिपति जी—चुनाव आयुक्त, 1988 बैच के केरल कैडर के IAS अफ़सर। जनवरी 2024 में सहकारिता मंत्रालय से रिटायर होते हैं और मार्च में सीधे चुनाव आयुक्त बना दिए जाते हैं। कार्यभार सँभालने के ठीक अगले दिन लोकसभा चुनाव की घोषणा होती है और महज़ एक साल के भीतर वे देश के मुख्य चुनाव आयुक्त बन जाते हैं।

ज्योतिपति: तो तुम्हारा मानना है कि खड़गे का यह बयान और राहुल गांधी द्वारा इस्तीफ़े की माँग यूं ही नहीं है?

ज्वाला: बिल्कुल नहीं! राहुल गांधी इस मुद्दे पर आर-पार के मूड में हैं। विपक्ष अब 30 तारीख़ को बड़ी बैठक कर रहा है और चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े को लेकर जन-आंदोलन की तैयारी है। पर मज़ाक देखिए ज्योतिपति जी, यह बात जनता तक पहुँची कैसे? जब चुनाव आयोग के ही अंदरूनी खींचतान (सहायक चुनाव आयुक्तों के मतभेद) की ख़बरें बाहर आईं! इसीलिए मैंने कहा—चोर मचाए शोर! संस्था के अंदर ही जब दरार हो, तो बाहर आवाज़ तो जाएगी ही।

ज्योतिपति: (गंभीरता से मुस्कुराते हुए) और यही पैटर्न तुम्हें कहीं और भी दिखता है क्या?

ज्वाला: बिल्कुल! यही हाल तो राम मंदिर के चढ़ावे वाले विवाद में भी हुआ। राम मंदिर बना, करोड़ों सनातनियों की बरसों की प्रतीक्षा पूरी हुई, यह बहुत ही शुभ हुआ। लेकिन जब व्यवस्था पूरी तरह सरकार और उससे जुड़े ट्रस्ट के अधीन थी, फिर भी चढ़ावे में धांधली की बातें बाहर आईं और जनता को पता चली, तो सवाल तो उठेगा ही ना कि पहरेदारी के बावजूद यह शोर क्यों मचा?

ज्योतिपति: लेकिन ज्वाला, अब तो भाजपा उल्टा राहुल गांधी से ही माफ़ी माँगने की ज़िद पर अड़ी है।

ज्वाला: वही तो सोचने वाली बात है ज्योतिपति जी! राहुल गांधी माफ़ी क्यों माँगे? उन्होंने तो वही कहा जो तंत्र के अंदर से छनकर बाहर आया। अब जब बात निकल ही गई है, तो दूर तक तो जाएगी ही!

ज्योतिपति: बात सिर्फ़ चुनाव आयोग या बयानों तक सीमित नहीं है ज्वाला, ज़रा सड़क का तापमान भी तो नापो।

ज्वाला: आप सही कह रहे हैं। आज सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ़ हर वर्ग सड़कों पर है।
युवा और Gen-Z: रोज़गार और अनिश्चितता से निराश होकर हड़ताल पर हैं।
किसान: एक बार फिर आंदोलन की राह पर हैं और चेतावनी दे रहे हैं।
सवर्ण समाज: ‘UGC रोलबैक’ के नारों के साथ नई मुहिम छेड़ चुके हैं।

क्या देश में एक अजीब सी राजनीतिक अस्थिरता का माहौल नहीं बन गया है? राजनीतिक बयानबाज़ी की बाढ़ में देश की आम जनता आज मझधार में फँसी दिख रही है।

ज्योतिपति: (चाय का कुल्हड़ नीचे रखते हुए) तुमने बहुत सटीक शब्द पकड़ा है ज्वाला
—‘मझधार’। चाहे SIR का मुद्दा हो या UGC रोलबैक का, जनता सत्ता और विपक्ष के दांव-पेचों के बीच फँसी है। 2029 का चुनाव अभी दूर ज़रूर है, लेकिन यह मँझधार तय करेगी कि जनता किनारे लगेगी या सत्ता की नाव इस राजनीतिक बहाव में बह जाएगी।

ज्वाला: और इसमें चुनाव आयोग का ताज़ा नाटक भी देख लीजिए! मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद की ख़बरें जब उड़ने लगीं, तो शनिवार को आनन-फानन में आयोग को बैठक करके प्रेस रिलीज़ जारी करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि “पश्चिम बंगाल और बिहार समेत देश भर में SIR के फ़ैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।”

ज्योतिपति: (गहरी साँस लेते हुए) प्रेस रिलीज़ से काग़ज़ साफ़ हो सकते हैं ज्वाला, लेकिन जनता के मन का संदेह इतनी आसानी से नहीं मिटता। यह तो आने वाला चुनावी मौसम ही बताएगा कि कौन सा मुद्दा मुख्यधारा में टिकता है और कौन राजनीति की बलि चढ़ जाता है। चलिए, देखते हैं कि ऊँट किस करवट बैठता है!
(संवाद के अंत में दोनों उठते हैं, पृष्ठभूमि में चुनावी राजनीति का ताना-बाना और गहराता दिखता है।)

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