नए भोर के साक्षी: अबूझमाड़ में लौटता विश्वास और घोटुल की थाप
बस्तर न्यूज – 30 अगस्त 2026
कुछ समय पहले तक नक्सल भय के कारण जहाँ शाम होते ही सन्नाटा पसर जाता था और लोग घरों में दुबकने को मजबूर थे, वहाँ अब मांदर की गूंज और कर्मा-रेलो के सुरीले बोल हवाओं में तैर रहे हैं। घोटुलों में लौटती यह रौनक महज़ सांस्कृतिक गतिविधियों का पुनरुत्थान नहीं है; यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि शांति और सुरक्षा के बल पर कैसे एक समाज अपना खोया हुआ आत्मविश्वास पुन: हासिल कर सकता है।
छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का अबूझमाड़—
जो कभी अपने सघन जंगलों और नक्सली हिंसा के साए के कारण मुख्यधारा से अलग-थलग महसूस करता था—आज एक नए भोर का साक्षी बन रहा है। क्षेत्र के अंदरूनी गांवों में सुरक्षा और विश्वास का माहौल बेहतर होने से आदिवासी संस्कृति की रीढ़ मानी जाने वाली सदियों पुरानी ‘घोटुल’ परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी है।
स्थानीय ग्रामीण स्वयं आगे आकर प्राकृतिक सामग्रियों से पारंपरिक घोटुल का पुनर्निर्माण कर रहे हैं। यह घोटुल केवल एक मिट्टी-पुआल का ढांचा भर नहीं है, बल्कि जनजातीय जीवन का सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र है। शाम ढलते ही यहाँ ‘चेलिक’ (युवक) और ‘मोटियारिन’ (युवतियाँ) एकत्र होते हैं। बुजुर्गों की छत्रछाया में युवा पीढ़ी अपने लोकगीतों, पारंपरिक नृत्यों, जीवन के संस्कारों, नैतिक मूल्यों और सामाजिक अनुशासन का पाठ सीख रही है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर में सुरक्षा और विकास का एक नया संतुलन देखने को मिल रहा है। सरकार न केवल हिंसा पर अंकुश लगाने में सफल हो रही है, बल्कि समृद्ध आदिवासी धरोहर के संरक्षण और संवर्धन को भी प्राथमिक एजेंडे में शामिल किया है। बुनियादी ढाँचे के सुदृढ़ीकरण के साथ-साथ पारंपरिक संस्थानों का पुनर्जीवन बस्तर के दूरस्थ अंचलों में सुशासन का असली अर्थ रेखांकित करता है। अबूझमाड़ के घोटुलों से उठती मांदर की थाप यह संदेश दे रही है कि भय का अंधकार छँट रहा है और आशा का सवेरा बस्तर के भविष्य को रोशन कर रहा है।
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