नौकरशाह या प्रजातंत्र-सीएचओ स्वास्थ्य विभाग ने किया कलेक्ट्रेट का घेराव
बेमेतरा -19 अगस्त 2026
(चौपाल पर नीम के पेड़ के नीचे ज्योतिपति अखबार पढ़ रहे हैं। तभी ज्वाला गुस्से में आता है और हाथ में पकड़ी एक खबर की ओर इशारा करता है)
जन चौपाल संवाद
ज्वाला: (आक्रोशित होकर) ज्योतिपति भैया! ज़रा यह खबर देखिए बेमेतरा की। स्वास्थ्य विभाग की महिला कर्मचारियों (CHO) को कलेक्टोरेट का घेराव करना पड़ रहा है! आरोप है कि अधिकारी उनके साथ अभद्र व्यवहार और मानसिक प्रताड़ना कर रहे हैं। महिला सुरक्षा की बातें सिर्फ कागज़ों पर रह गई हैं क्या? आखिर लोकतंत्र में नौकरशाह जनता के मालिक कैसे बन बैठे?
ज्योतिपति: (अखबार को समेटकर चश्मा उतारते हुए) शांत हो जाओ ज्वाला। गुस्सा होना स्वाभाविक है, लेकिन किसी भी मुद्दे पर विचार कानून और संविधान की कसौटी पर रखकर करना चाहिए। बेमेतरा में महिलाओं ने जो प्रदर्शन किया है, वह लोकतंत्र में अपनी बात रखने का उनका संवैधानिक अधिकार है।
ज्वाला: अधिकार तो ठीक है भैया, लेकिन सवाल यह है कि जब जनप्रतिनिधियों को जनता चुनती है, तो फिर ये अधिकारी खुद को ‘वायसराय’ क्यों समझने लगते हैं? यहाँ तक कि सांसद-विधायक भी कहते हैं कि अफ़सर फोन नहीं उठाते। जंतर-मंतर पर छात्र, युवा और किसान आंदोलन कर रहे हैं,यह सब कहीं नौकरशाही पर निर्भर रहने का नतीजा तो नहीं!?
जब हर वर्ग सड़क पर है, तो क्या यह प्रजातंत्र है या अफ़सरशाही?या कोई समानांतर व्यवस्था चल रही है।
ज्योतिपति: देखो ज्वाला, हमें ‘नौकरशाही’ (ब्यूरोक्रेसी) और ‘प्रजातंत्र’ (डेमोक्रेसी) के फर्क और संबंध को समझना होगा।
हमारे संविधान ने एक समानांतर व्यवस्था नहीं, बल्कि एक पूरक व्यवस्था बनाई है। जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि यानी ‘विधायिका’ नीतियाँ बनाती है, और उस नीति को लागू करने की ज़िम्मेदारी ‘कार्यपालिका’ यानी नौकरशाही की होती है। बिना प्रशासनिक ढाँचे के कोई भी सरकार काम नहीं कर सकती।
ज्वाला: बात तो आपकी ठीक है भैया, लेकिन जब यही अफ़सर अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने लगें, छोटे कर्मचारियों को नौकरी से निकालने या CR खराब करने की धमकी देने लगें, तो न्याय कहाँ मिलेगा? पत्रकार तक नौकर शाही के दफ्तरों में जाते हैं तो बैठने तक को नहीं कहा जाता!
ज्योतिपति: अगर कोई भी अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करता है या मातहत कर्मचारियों के साथ अभद्रता करता है, तो वह कानूनन अपराध और सेवा नियमों का उल्लंघन है। बेमेतरा वाले मामले में ही देखो—कलेक्टर ने मामले की गंभीरता को देखते हुए ‘विशाखा समिति’ का गठन किया है।
कानून ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए यह स्पष्ट व्यवस्था बनाई है कि कार्यस्थल पर यौन या मानसिक उत्पीड़न की निष्पक्ष जाँच हो।
ज्वाला: पर भैया, आरोप लगने पर अधिकारी तो सीधा मुकर जाते हैं, जैसे यहाँ भी CMHO ने आरोपों को निराधार बता दिया। जब तक जाँच होगी, तब तक पीड़ित कर्मचारियों का क्या?
ज्योतिपति: नियम और कानून की नज़र में “जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक हर व्यक्ति निर्दोष है।” इसलिए निष्पक्ष जाँच ज़रूरी है।
अगर जाँच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो अनुशासनात्मक कार्रवाई भी होती है और निलंबन भी। हमारी व्यवस्था में कोई भी अफ़सर कानून से ऊपर नहीं है।
लोकतंत्र की ताकत यही है कि यहाँ एक आम नागरिक भी कानून के रास्ते से बड़े से बड़े अधिकारी को जवाबदेह बना सकता है।
ज्वाला: आप सही कह रहे हैं भैया, लेकिन सुधार की ज़रूरत तो है ना? चाहे शिक्षा में असमानता हो या दफ्तरों में अफ़सरों का रवैया, जनता और प्रशासन के बीच का यह फासला खत्म होना चाहिए।
ज्योतिपति: बिल्कुल! सुधार की गुंजाइश हमेशा रहती है। प्रजातंत्र तभी मजबूत होगा जब:
प्रशासन में पारदर्शिता और संवेदनशीलता हो।जनप्रतिनिधि और अफ़सरशाही जनता के प्रति जवाबदेह रहें।
नागरिक भी अपने अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति जागरूक रहें।
आंदोलन और प्रदर्शन शासन को उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलाने का ज़रिया हैं, लेकिन समाधान हमेशा कानून, संविधान और संवाद के दायरे में ही निकलता है।
ज्वाला: (सोचते हुए) आपकी बात से समझ आया भैया। अफ़सरशाही को व्यवस्था से मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन कानून के सही इस्तेमाल से उसे जनता का सेवक बनाए रखा जा सकता है। चलिए, देखते हैं बेमेतरा मामले में विशाखा समिति की रिपोर्ट में क्या निकलकर आता है।
ज्योतिपति: (मुस्कुराते हुए) बिल्कुल ज्वाला, जागरूक नागरिक ही एक मजबूत लोकतंत्र की पहचान हैं!
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