लोकतंत्र पर पड़ता पूंजीवाद की नजर
न्यूज डेस्क -11 अगस्त 2026
भवति भिक्षां देहि”
प्रजातंत्र में वोट मांगना भी एक भिक्षा का स्वरूप है और ‘मतदान’ शब्द में तो खुद ‘दान’ ही लिखा हुआ है, अतः इन दोनों का भाव मिलकर केवल और केवल जनता की सच्ची सेवा होना चाहिए।
आज लोकतंत्र का अर्थ पैसे की राजनीति रह गई है। जिसके पास पैसा है, वही चुनाव लड़ सकता है और वही जनता को प्रलोभित कर वोट बटोर सकता है। यह स्थिति एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरे की निशानी है। जब लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत देश में प्रजातंत्र की स्थापना की गई थी, उस समय उसकी सोच बेहद महान रही होगी।
हमारे देश में प्रवृत्तियों को लेकर तीन तरह के विचार देखे जाते हैं—पहला, मांग कर खाओ; दूसरा, बांटकर खाओ (जिसे व्यवसाय बनाया गया); और तीसरा, छीन कर खाओ और राज करो। इनमें से सबसे सर्वोत्तम प्रवृत्ति ‘मांग कर खाने’ को माना गया था।
इसके कई ऐतिहासिक और पौराणिक उदाहरण हैं। भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर बली से धरती को बचाया यानी मांग लिया। जब हिरण्याक्ष ने धरती को रसातल में फेंक दिया, तब विष्णु ने वराह बनकर उसकी रक्षा की।
इसी प्रकार, गुरुकुल में शिक्षा ग्रहण करने वाले सभी छात्र, चाहे वे किसी भी वर्ण या संप्रदाय के हों, उन्हें भिक्षा मांगने की परंपरा के तहत नगर में भेजा जाता था ताकि उनके भीतर विनम्रता और ‘मांग कर खाने’ की प्रवृत्ति बनी रहे।
इसका उद्देश्य यह था कि वे भविष्य में कभी किसी का हक छीनकर, पैसे का प्रलोभन देकर सत्ता प्राप्त न कर सकें और जनता, समाज तथा देश को डरा न सकें।
लेकिन आज प्रजातंत्र की वह मूल भावना पूरी तरह परिवर्तित हो चुकी है। पहले के लोग 500 से 2000 रुपये में चुनाव लड़ लेते थे, जबकि आज के समय में कोई भी चुनाव करोड़ों रुपये के बिना नहीं लड़ा जाता। इसके ऊपर राजनीतिक दलों की मुफ्त की योजनाएं और जन-प्रलोभन वाली बातें चुनावी मैदान में उतर आती हैं।
यदि यही हाल रहा, तो एक दिन इतिहास खुद को दोहराएगा। जैसे अंग्रेज व्यापार करने भारत आए थे और फिर देश को गुलाम बना लिया, वही स्थिति अब दोबारा पैदा होने की कगार पर है।
आज पूंजीवाद धीरे-धीरे प्रजातंत्र को खरीदने की फिराक में है, जहाँ चुनावों में खरीद-फरोख्त का बाजार गर्म होता जा रहा है।
जब पूंजीवाद का दायरा बढ़ता है, तब ‘लूट वाद’ जन्म लेता है—यानी लूटो और सब कुछ अपने कब्जे में ले लो। यह वही ‘छीन कर खाने’ की प्रवृत्ति है। इसका परिणाम यह होता है कि जिसके पास पैसा या ताकत नहीं है, वह कितनी भी योग्यता क्यों न रखता हो, चुनाव लड़ने की सोच भी नहीं सकता।
धनबल से बड़ा है श्रमबल जहां बहुतायत जनसंख्या है।
ऐसे में बाहुबली और धनबल वाले ही चुनाव जीतने का दमखम रखते हैं और वे ही प्रजातंत्र के परिणामों को अपनी मर्जी से प्रभावित करते हैं, जैसा कि हम लगातार देख भी रहे हैं।
यदि आज सचमुच इस प्रजातंत्र को बचाना है, तो सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि पैसे के प्रभाव को इससे पूरी तरह दूर किया जाए। प्रजातंत्र को एक पवित्र ‘अनुष्ठान’ और मतदान को एक निष्कलंक ‘यज्ञ’ की भावना से पूरा किया जाना चाहिए—न कि चुनाव के दौरान महंगी-महंगी गाड़ियों का काफिला दौड़ाकर, जनता को प्रलोभनों का लालच देकर, या बंदूक और ताकत के सहारे चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की मानसिकता के साथ।
एक स्वस्थ प्रजातांत्रिक प्रणाली, जिसकी कल्पना हमारे विचारकों ने की थी, उसे अब केवल कागजों पर नहीं बल्कि अपनी वास्तविक परिणति में उतारने का समय आ गया है।
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख केवल वैचारिक अभिव्यक्ति है, इसका उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहत करना नहीं है।
(दीपक पांडेय)
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