सपादलक्षेश्वर धाम, सलधा — 09 अगस्त 2026
धर्मसभा एवं पावन सत्संग
शिवनाथ नदी के तट पर स्थित पावन सपादलक्षेश्वर धाम, सलधा में आयोजित दिव्य चातुर्मास व्रत अनुष्ठान महामहोत्सव के अंतर्गत आज ज्योतिष पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के सान्निध्य में धर्म प्रवचन का आयोजन हुआ।
कार्यक्रम का शुभारंभ स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी द्वारा गुरु वंदन से हुआ। इसके पश्चात हनुमत वंदन, श्री नारायण स्तवन और धर्म आह्वान के साथ गुरुपादुका पूजन संपन्न हुआ। तदुपरांत, शंकराचार्य जी महाराज ने अपने ओजस्वी वचनों से उपस्थित धर्मप्रेमियों को ज्ञान गंगा से तृप्त किया।
जीवन के दो शत्रु और धर्म का मार्ग
शंकराचार्य जी ने अपने प्रवचन में मनुष्य जीवन के संघर्षों और शत्रुओं का विस्तृत विवेचन करते हुए2 बताया:
”मानव जीवन का सामना दो प्रकार के शत्रुओं से होता है—एक बाहरी शत्रु और दूसरे आंतरिक शत्रु। जीवन में इन शत्रुओं से दो उद्देश्यों के लिए संघर्ष करना पड़ता है: पहला, शत्रु को केवल परेशान करने के लिए; और दूसरा, उस पर विजय प्राप्त करने के लिए।”
उन्होंने मार्गदर्शन करते हुए कहा कि यदि उद्देश्य केवल परेशान करना हो, तो किसी भी प्रकार से लड़ाई लड़ी जा सकती है। किंतु यदि लक्ष्य पूर्ण विजय प्राप्त करना है, तो संघर्ष हमेशा धर्म के मार्ग पर चलकर ही करना चाहिए।
- धर्मानुसार संघर्ष: जब कोई धर्म के लिए और धर्म के मार्ग पर चलकर संघर्ष करता है और कठिनाइयाँ आने पर कमजोर पड़ने लगता है, तब भगवान स्वयं उसकी रक्षा के लिए आगे आते हैं। भक्त की रक्षा के लिए ही भगवान विष्णु ने समय-समय पर विभिन्न अवतार लिए हैं।
आंतरिक शत्रु: षड्रिपु और भगवान गणेश का संदेश
मनुष्य के भीतर निवास करने वाले आंतरिक शत्रुओं की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के साथ चलने वाले आंतरिक संबंध तीन प्रकार के होते हैं—मित्र, शत्रु और तटस्थ। इनसे पहले हमें अपने भीतर छिपे विकारों को पहचानना होता है।
सनातन धर्म में मनुष्य की पतन और बर्बादी का मुख्य कारण बाहरी शत्रुओं को नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे विकारों को बताया गया है। इन्हें षड्रिपु (छह आंतरिक शत्रु) कहा जाता है:
- काम,क्रोध,मोह,लोभ,मद मत्सर (इर्ष्या)
इन छह आंतरिक शत्रुओं का नाश करने वाले देवता भगवान श्री गणेश हैं। पुराणों में भगवान गणेश के विभिन्न अवतारों और उनके द्वारा असुरों के वध का जो वर्णन मिलता है, वह वस्तुतः मनुष्य के भीतर के इन्हीं छह विकारों एवं आसुरी वृत्तियों का नाश करने का प्रतीक है।
गौमाता की प्रतिष्ठा और सवा लाख शिवलिंग स्थापना
सत्संग सभा को संबोधित करते हुए स्वामी ज्योतिर्मयानंद जी ने सनातन धर्म के समक्ष वर्तमान चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की और गौमाता की महत्ता पर बल दिया।
- शास्त्रों के अनुसार गौमाता के शरीर में तैंतीस कोटि (33 करोड़) देवताओं का वास है।
- सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए गौमाता को देश में ‘राष्ट्रमाता’, प्रदेश में ‘राज्यमाता’, ग्राम में ‘ग्राम्यमाता’ और घर में ‘गृहमाता’ का दर्जा मिलना चाहिए।
- सपादलक्षेश्वर धाम, सलधा में सवा लाख शिवलिंगों की स्थापना का संकल्प लिया गया है। श्रद्धालु अपने पारिवारिक एवं मांगलिक शुभ अवसरों पर शिवलिंग प्रतिस्थापित कर इस ऐतिहासिक एवं धार्मिक अनुष्ठान में सहर्ष अपना योगदान दे रहे हैं।
विशिष्ट उद्बोधन: मोतीराम चंद्रवंशी (पूर्व विधायक, पंडरिया)
पंडरिया के पूर्व विधायक श्री मोतीराम चंद्रवंशी ने सलधा आश्रम पहुँचकर शंकराचार्य जी के दर्शन किए और उनका आशीर्वाद प्राप्त किया। सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा:
”यह हमारा सौभाग्य है कि हमें इस दिव्य चातुर्मास में शिव अवतार स्वरूप शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के साक्षात् दर्शन और आशीर्वाद का पुण्य प्राप्त हुआ है।”
उन्होंने आगे कहा कि सलधा धाम में निर्मित हो रहा सवा लाख शिवलिंगों का यह प्रांगण न केवल देश बल्कि एशिया का अत्यंत प्रख्यात मंदिर बनेगा, जिससे स्थानीय क्षेत्र को भी अपार गौरव और लाभ प्राप्त होगा।
शंकराचार्य जी की धर्मनिष्ठा की प्रशंसा करते हुए उन्होंने कहा कि स्वामी जी अपने सनातन अटल इरादों से कभी पीछे नहीं हटते। रामसेतु की रक्षा का आंदोलन हो, कवर्धा का झंडा प्रकरण हो, या साजा की घटना—स्वामी जी ने सदैव सनातन धर्म का झंडा बुलंद रखा है और वीडियो के माध्यम से निरंतर मार्गदर्शन प्रदान किया है। गौमाता को राष्ट्रमाता बनाने का उनका प्रयास अद्वितीय है। “सनातन सर्वोपरि है, धर्म सर्वोपरि है”—यही उनके जीवन का ध्येय है।
आज के सत्संग प्रवचन कार्यक्रम में धाम के बृहत बटुकों के साथ ब्राह्मण समाज के पदाधिकारी सहित आस पास के गांवों के ग्रामीण विशाल जन समूह के रूप में सभा स्थल में सत्संग का लाभ लिए।


