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Monday, June 22, 2026

धरती की चीख —और प्यासा अंबर: क्या हम सुन और देख नहीं रहे

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विशेष जागरूकता लेख/जल है तो कल है-
20 जून 2026

पहले एक सवाल
पृथ्वी पर 71% पानी है।
फिर भी पीने का पानी नहीं !!

यह विरोधाभास नहीं — यह हमारी करनी का नतीजा है।
हमने क्या किया धरती के साथ

पेड़ काटे — जो बादल बुलाते थे,पानी ऊपर भेजते थेl
जंगल उजाड़े — जो पानी रोकते थे।
कुआँ पाटा — जो भूजल भरते थे।
कॉन्क्रीट बिछाया — जो बारिश का पानी जमीन में नहीं जाने देता।
बादल से मिला पानी व्यर्थ बहा दिया — नालियों में, नदियों में, समुद्र में।

और अब —
कारखाने को पानी चाहिए।
वाहन धोने को पानी चाहिए।
स्विमिंग पूल को पानी चाहिए।

पीने के लिए पानी कहाँ बचे?
समुद्र का पानी पीयें? — नहीं पी सकते

धरती पर इतना पानी है तो समुद्र का पानी क्यों नहीं पीते?
क्योंकि समुद्र का पानी नमकीन है। उसे पीने योग्य बनाने की प्रक्रिया इतनी महंगी और ऊर्जा खपाने वाली है कि पूरी दुनिया की प्यास नहीं बुझा सकती।

और समुद्र की गहराई मात्र 14 किलोमीटर है शायद नहीं
समुद्र की औसत गहराई लगभग 3.5 किलोमीटर है।जानकारी आधार पर।अधिकतम गहराई मारियाना ट्रेंच — लगभग 11 किलोमीटर है।टाइटैनिक जहाज भी कितनी गहराई में पड़ा है यह पढ़ लेना।लेख कोई दस्तावेज नहीं है।
धरती की त्रिज्या लगभग 6,371 किलोमीटर है — यह सही हो सकता है।

धरती की गहराई 6000 किलोमीटर से भी ज्यादा ये समझने के लिए।

यानी समुद्र धरती की सतह पर बिछी एक पतली चादर भर है,मशीनरी तेल ईंधन के लिए उसे भी फाड़ा जा रहा है।पानी नहीं तेल का कुआं चाहिए , आदमी पानी पिए या ना पिए मशीन को पिलाने तेल ईंधन चाहिए ।
खाते तो दाल चावल है या मांस मटन है जिसे मशीन से पैदा नहीं कर सकते, इस धरती से ही पैदा किया जा सकता है पानी की जरूरत है।

जब यह चादर गर्म होगी — उबलेगी। बादल बनेंगे। लेकिन बरसेंगे कहाँ — जब जंगल ही नहीं बचे पानी रोकने को?
भूजल — आखिरी उम्मीद को भी खोद डाला

पहले कुआँ हमारी सभ्यता की धरोहर था।

प्रकृति सदियों से बारिश का पानी छानकर, रिसाकर जमीन के अंदर सहेजती थी। हमने नल लगाए, मोटर लगाई और उस संचित पानी को दशकों में खींच लिया।

अब भूजल स्तर हर साल नीचे जा रहा है।
जो पानी प्रकृति ने हजारों साल में जमा किया — हमने पचास साल में खाली कर दिया क्यों विकास ही विकास।

विकास से हमने क्या पैदा किया प्लास्टिक — जो मरता नहीं, बस छुप जाता है। पहले देखा था लकड़ी की गाड़ी बचपन में लकड़ी के खिलौने बाजार में लकड़ी की बैल-गाड़ी सवारी गाड़ी,छकड़ा फिर लकड़ी की छड़ी बुढ़ापे में ।

अब जंगल तो है नहीं लकड़ी युग खतम।

और इस सबके ऊपर —
वो प्लास्टिक जो हमने धरती पर फेंका, नदियों में बहाया, समुद्र में डाला वो क्या!!

प्रकृति लोहे को सड़ा सकती है। मुर्दे को पचा सकती है। लेकिन प्लास्टिक को नहीं।

हजारों साल बाद भी प्लास्टिक ज्यों का त्यों रहेगा। बस टूटता रहेगा — इतना छोटा कि दिखे नहीं।
माइक्रोप्लास्टिक!!

वो मिट्टी में मिला। पानी में घुला। पौधों में पहुँचा। जानवरों में गया। और अब —हमारे खून में है।स्पर्म काउंटिंग कमजोर फिर कभी।


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