डिजिटल डेस्क 06 जून 2026
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को सोचने पर मजबूर कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 60 वर्षों में मानव आहार में एक आमूलचूल बदलाव आया है — लोग तेजी से शाकाहार छोड़कर मांसाहार की ओर बढ़ रहे हैं, और इसके परिणाम हमारी पृथ्वी के लिए अत्यंत गंभीर होते जा रहे हैं।
60 साल में दोगुनी हो गई मांस की खपत
FAO के आंकड़े बताते हैं कि 1961 में प्रति व्यक्ति मांस की वार्षिक खपत मात्र 25 किलोग्राम थी, जो आज बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष हो गई है। यानी केवल छह दशकों में यह खपत लगभग दोगुनी हो गई।
सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा चिकन का है — 1961 की तुलना में चिकन की खपत में 6 गुना की वृद्धि दर्ज की गई है, जो इसे दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता हुआ मांस उत्पाद बनाती है।
— धरती पर इसका गहरा असर हो रहा है।मांस उत्पादन में हुई इस अभूतपूर्व वृद्धि ने पर्यावरण पर कई गहरे घाव किए हैं:
जंगलों का विनाश किया जा रहा है।लाखों हेक्टेयर वन भूमि को चारागाह और पशु चारे की खेती के लिए काटा जा रहा है। अमेज़न जैसे दुनिया के सबसे बड़े जंगल इसकी सबसे बड़ी कीमत चुका रहे हैं।
ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन काफी प्रभावित हो रहा है।
पशुपालन उद्योग दुनिया की कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में करीब 14.5% का योगदान देता है। गायों और भैंसों से निकलने वाली मीथेन गैस जलवायु परिवर्तन को तेज कर रही है।
भारत और पूरे विश्व में पानी का संकट खड़ा होने लगा है।एक किलोग्राम बीफ के उत्पादन में लगभग 15,000 लीटर पानी की जरूरत होती है, जबकि एक किलो गेहूं के लिए मात्र 1,500 लीटर। पशुपालन दुनिया के मीठे पानी का एक बड़ा हिस्सा खपत कर रहा है।
भूमि का बेतरतीब दुरुपयोग किया जा रहा है।दुनिया की कुल कृषि योग्य भूमि का 80% हिस्सा पशुपालन के लिए इस्तेमाल होता है, जबकि यह उद्योग कुल कैलोरी उत्पादन का केवल 20% ही प्रदान करता है।
– भारत की स्थिति पर नजर डाले तो,भारत परंपरागत रूप से शाकाहारी संस्कृति का देश रहा है, लेकिन यहाँ भी बदलाव की हवा चल रही है। शहरीकरण, बढ़ती आय और बदलती जीवनशैली के चलते चिकन और अंडे की खपत तेजी से बढ़ रही है। भारत आज दुनिया के सबसे बड़े पोल्ट्री उत्पादकों में शामिल हो गया है।
क्या है समाधान?जिस ओर ध्यान दिया जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस संकट से निपटने के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे:
“प्लांट-बेस्ड डाइट” की ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ाना। “मीट-फ्री मंडे” जैसे अभियानों को बढ़ावा देना और टिकाऊ पशुपालन तकनीकों को अपनाना होगा। खाद्य बर्बादी को कम करने के साथ सरकारों द्वारा पर्यावरण अनुकूल आहार नीतियाँ बनाना जरूरी है।
सार निष्कर्ष
स्वाद का यह सफर जितना आनंददायक लग रहा है, उतना ही हमारी धरती के लिए खतरनाक साबित हो रहा है। FAO की यह रिपोर्ट एक स्पष्ट चेतावनी है — अगर हमने अभी नहीं सोचा, तो आने वाली पीढ़ियाँ न सिर्फ स्वच्छ हवा और पानी से, बल्कि खाद्य सुरक्षा से भी वंचित हो सकती हैं। थाली में बदलाव लाना अब केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि पृथ्वी को बचाने का सवाल बन गया है।


