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Friday, June 5, 2026

मन की बात:स्वयं को देखना है मन को दर्पण बनाएं और भरपूर जीने की चाह रखे

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रविवारीय-19/04/2026

पहली सोच
मन मारते-मारते जिंदगी कब संवेदना विहीन हो गई,पता ही नहीं चला। जिस उम्र को जी भर कर जीने की चाह थी, उस उम्र से ही नफरत हो गई, जैसा सोचा था वैसा कुछ भी नहीं हुआ, जैसे सारे ख्वाब ख्वाहिशें और वो सपनें सबकुछ अधूरे रह गए।

आज के मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष बाहर की दुनिया से नहीं, भीतर की टूटने से है। धैर्य का अभ्यास करते-करते वह भीतर से ऐसा खंडित हो जाता है कि उसकी चेतना ही थकने लगती है। कभी मन में आकांक्षाओं की चंचल नदी बहती थी, सब कुछ पा लेने का साहस था, पर अब उसी जीवन में एक मौन-सा ठहराव उतर आया है।

ऐसा लगता है जैसे हम जीवन को जी नहीं रहे, बल्कि उसके बोझ को धीरे-धीरे ढो रहे हैं। धैर्य, जो कभी आत्मबल का स्वरूप था, कई बार परिस्थितियों के आगे निरंतर झुकते-झुकते मौन पीड़ा में बदल जाता है; और मनुष्य अपने ही भीतर की उजास को खोता चला जाता है ।

किन्तु दर्शन हमें केवल पीड़ा का वर्णन नहीं, दृष्टि का विस्तार भी देता है। जीवन की कठोरताओं के सामने सब कुछ सह जाना ही अंतिम सत्य नहीं है; प्रश्न यह है कि सहने के इस अनुभव से चेतना क्या सीखती है। गीता की समता-बुद्धि यही सिखाती है कि सुख-दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल, प्रिय-अप्रिय—सबको एक व्यापक दृष्टि से देखा जाए, ताकि मन परिस्थितियों का दास न बने। जो बात हमें तोड़ती हुई प्रतीत होती है, वही यदि समझ और आत्मनिरीक्षण के साथ जिया जाए, तो वह अंततः भीतर की दृढ़ता बन सकती है ।

दूसरी सोच
अब ज्यादा सोचना नहीं है सब अपने में व्यस्त हैं,आप भी हो जाइए लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, इसे लेकर आपको अधिक विचार करने की आवश्यकता ही नहीं है। वास्तविकता यह है कि, दूसरों की आपके बारे में काफी कम राय होती है।

हम प्रायः यह मान लेते हैं कि लोग हमारी हर कमी, हर असफलता और हर चूक को बहुत ध्यान से देख रहे हैं। पर सच यह है कि अधिकांश मनुष्य अपने ही जीवन, अपनी ही उलझनों और अपनी ही असुरक्षाओं में इतने व्यस्त होते हैं कि दूसरों के बारे में उनकी सोच हमारी कल्पना से कहीं कम होती है। हम अपने भीतर एक अनावश्यक निगाहें गढ़ लेते हैं, और फिर उन्हीं काल्पनिक निगाहों के डर से अपने व्यवहार, अपने साहस और अपनी सहजता को सीमित कर लेते हैं ।

दार्शनिक दृष्टि से देखें तो यह बाहरी संसार का नहीं, अहं के अतिशय विस्तार का प्रश्न है। जब व्यक्ति अपने को ही केंद्र मान लेता है, तब उसे हर ओर आलोचना, तिरस्कार और मूल्यांकन दिखाई देने लगता है। लेकिन यदि वह थोड़ी दूरी से जीवन को देखे, तो समझ आता है कि अधिकांश लोग हमारे विषय में सोच ही नहीं रहे होते; वे स्वयं अपने भीतर के प्रश्नों से जूझ रहे होते हैं । इस बोध के साथ मन हल्का होता है, और जीने का स्वाभाविक साहस लौट आता है।

अगली बार जब आप खुद के बारे में शर्मिंदगी महसूस करें, तो याद रखें कि आप खुद के बारे में सोच रहे हैं। आप सुरक्षित रूप से मान सकते हैं कि आपके आस-पास हर कोई लगभग वैसा ही कर रहा है।




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