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Friday, June 5, 2026

विनाश के मुहाने पर मानवता: मिसाइल के युग में शांति की खोज

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पश्चिम एशिया संकट/ईरान/इजरायल/अमेरिका
07/04/2026

पीपल के पुराने पेड़ से छनकर आती धूप मुंडेर पर बैठी इन दो शख्सियतों के चेहरों पर गहरी लकीरें उकेर रही थी। ज्योति पति अपनी धवल धोती संवार रहे थे, तो ज्वाला की नजरें सामने पसरे खाली मैदान पर जमी थीं, जैसे वह वहां भविष्य का कोई नक्शा पढ़ रहे हों।

ज्वाला: (एक लंबी आह भरकर) ज्योति पति जी, आज की हवा में वो ताज़गी नहीं रही। ऐसा लगता है जैसे हर झोंके के साथ बारूद की गंध और बेचैनी घुली हुई है। हम चाँद-मंगल की बातें तो कर रहे हैं, पर इंसान के भीतर का विवेक मरता जा रहा है। ये कैसा विकास है जहाँ हम एक बटन दबाकर शहर के शहर राख करने की ताकत तो रखते हैं, पर एक रोते हुए बच्चे के आंसू पोंछने का धीरज नहीं बचा?

ज्योति पति: (गंभीर स्वर में) ज्वाला, तुमने हवा की बेचैनी को सही पहचाना। दरअसल, यह ‘वैचारिक आंधी’ का दौर है। आज इंसान ने बाहर की दुनिया को तो जीत लिया, पर अपने भीतर के दानव से हार गया है। विनाश की तैयारी को ही लोग आज प्रगति का नाम दे रहे हैं। हम जिस धर्म की दुहाई देते हैं, वह तो जोड़ने के लिए था, पर आज उसी की आड़ में नफरत की दीवारें खड़ी की जा रही हैं।

ज्वाला: वही तो! लोग कहते हैं ‘स्वस्थ समाज’ चाहिए, पर समाज तो विचारों से बीमार हो चुका है। सत्ता का नशा, मज़हब की कट्टरता और हथियारों की होड़—क्या यही विरासत हम अपनी आने वाली पीढ़ी को देंगे? आज का युवा नशे की गिरफ्त में है, चाहे वो पदार्थों का नशा हो या सोशल मीडिया पर फैलती झूठी नफरत का। हमें तो एक ऐसा समाज चाहिए था जो ‘विचारक’ हो, जो सवाल पूछे, जो शांति की भाषा समझे।

ज्योति पति: (धैर्य से समझाते हुए) समाज विचारक तभी बनेगा ज्वाला, जब हम ‘स्व’ से ऊपर उठकर ‘सर्व’ की सोचेंगे। देखो, युद्ध कभी समाधान नहीं होता। वह तो सिर्फ विनाश का एक चक्र है। असली ‘राजधर्म’ तो वह है जो अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के चूल्हे की चिंता करे। आज जब दिल्ली में पढ़ रहा छात्र महंगे सिलेंडर और अनिश्चित भविष्य से जूझता है, तो समझो कि सत्ता अपने राजधर्म से भटक गई है।

ज्वाला: सच कहा आपने। हमें हथियारों की नहीं, एक ‘वैश्विक अदालत’ और ‘वैश्विक चेतना’ की ज़रूरत है। एक ऐसी व्यवस्था जहाँ व्यापार प्रतिद्वंद्विता तो हो, पर वह किसी देश को पाषाण युग में न धकेले। हमें मिसाइलों के नशे से मुक्त होकर मानवता के स्वास्थ्य पर ध्यान देना होगा।

ज्योति पति: (आसमान की ओर देखते हुए) रास्ता कठिन है, पर असंभव नहीं। इस वैचारिक आंधी को रोकने के लिए शांति की मशाल जलानी होगी। जब तक चौपालों पर बैठा इंसान सजग नहीं होगा, तब तक महलों में बैठे लोग युद्ध का खेल खेलते रहेंगे। हमें युवाओं को हथियार नहीं, ‘विचार’ देने होंगे। एक ऐसा स्वस्थ समाज बनाना होगा जहाँ नफरत की जगह न्याय और युद्ध की जगह योग (जुड़ाव) हो।

ज्वाला: (मुस्कुराते हुए) चलिए, आज इस चौपाल से कम से कम एक वैचारिक बीज तो बोया गया। शायद यही बीज कल एक विशाल वटवृक्ष बने, जिसकी छांव में पूरी दुनिया चैन की सांस ले सके।

चर्चा निष्कर्ष: दोनों मौन हो जाते हैं, पर वह मौन खाली नहीं था; उसमें एक नए समाज की संकल्पना और भविष्य की चिंता का गहरा दर्शन छिपा था।

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