दृश्य 2:त्रिकोणीय दंगल—सरकार, अदालत,जनता और (मीडिया- दर्शक)
हास्य व्यंग लेख – 13 अक्टूबर 2026
जब जनता को लगता है कि उसके साथ धोखा हो रहा है, देश की स्थिति लगातार बदतर हो रही है और लोकतंत्र की दिशा ही बदलती दिख रही है, तो अपने प्रजातंत्र अर्थात् शहद को बचाने के लिए जनता स्वयं मधुमक्खी बनकर भिनभिनाने लगती है।
स्थान: जंतर-मंतर की खुली सड़क (एक तरफ बैरिकेड्स, दूसरी तरफ कानून की किताबें लिए एक मंच, और बीच में खड़ा जनता का हुजूम)।
(स्टेज पर ज्योतिपति एक तरफ प्रजातंत्र की किताब थामे खड़े हैं, और ज्वाला सिंह दूसरी तरफ तंज भरे मुस्कुराहट के साथ हाथ नचा रहे हैं।)
ज्योतिपति: ( किताब की ओर इशारा करते हुए) देखो ज्वाला भाई, एक तरफ हमारी सरकार है जिसके पास सत्ता का चाबुक है, दूसरी तरफ कानून और अदालत है जो न्याय की तराजू लेकर बैठी है, और बीच में ये अड़ी हुई जनता है।
देखा जाए तो यह पूरा संघर्ष अब त्रिकोणीय हो चला है—सरकार अपनी सुविधा ढूंढती है, अदालत संतुलन साधती है, और जनता अपने हक के लिए पिसती है!
ज्वाला सिंह: (ठहाका लगाते हुए) बिल्कुल सही फरमाया ज्योतिपति भाई! यही तो इस खेल का असली मजा है। सरकार चाहती है कि आवाज़ मखमली कमरों और दूर-दराज के मैदानों में कैद रहे ताकि कानों को सुकून मिले।
अदालत कहती है— “कानून के दायरे में रहो, भाई! मक्खी मारने के लिए हथौड़ा थोड़ी उठा लोगे?” और जनता कहती है— “हम न मक्खी हैं, न कमज़ोर! हम तो वो सच हैं जो इस त्रिकोणीय दंगल में सबको नचा रहे हैं!”
ज्योतिपति ने गहरे दार्शनिक अंदाज़ में कहा:
“देख ज्वाला! प्रजातंत्र में प्रजा तो बच्चों के समान होती है। हमारे शास्त्रों और किताबों में भी तो यही लिखा है न कि राजा अपनी प्रजा को अपने बच्चों की तरह पाले!
पर अब ज़रा सोच… अगर बच्चे अपने ही घर के आंगन में न खेलें और उन्हें दूर किसी पहाड़ी पर या कोसों दूर रामलीला मैदान में खेलने के लिए खदेड़ दिया जाए, तो पिता के दिल पर क्या गुज़रेगी? क्या बच्चे अब राम रावण युद्ध देखेंगे?!
ज्वाला ने कहा -क्या? जो कल तक आंखों के तारे थे,सत्ता के सहारे थे वो आज आंखों में ही खटकने लगे हैं? कमाल की बात है… ज्योतिपती जी चुनाव के समय यही मतदाता सर-आंखों पर बिठाए जाते हैं, और चुनाव बीतते ही सिर का दर्द बन जाते हैं!” चुनाव और सरकार यह दो रूप जनता कब समझेगी।
दृश्य 2: व्यंग्य की धार और कानून की मार
ज्योतिपति: (गंभीर आवाज़ में) कानून अपनी जगह अटल है, सरकार अपनी जगह ताकतवर है, लेकिन जब-जब व्यंग्य का बाण चलता है, तब-तब बड़े-बड़े महलों के शीशे हिल जाते हैं।
कानून कहता है कि जंतर-मंतर पर भीड़ से ट्रैफिक रुकता है, इसलिए बुराड़ी रामलीला मैदान या सीबीडी मैदान कहीं भी जाओ आप जनता है तो हम जनार्दन है ,पर क्या कानून ये नहीं जानता कि लोकतंत्र की असली चमक नज़दीकियों से है, दूरियों से नहीं?
ज्वाला सिंह: (व्यंग्य के लहजे में अपनी मूंछें तनियाते ) ए भाई ये कानून भी ना, कभी-कभी अजीब पहेली बन जाता है। अदालत ने कहा—खबरों पर जानें की मक्खी भगाने के लिए हथौड़ा नहीं चलाना।
बात ठीक है, भाई! कोर्ट का हथौड़ा तो न्याय के फैसले सुनाने के लिए होता है, ये जन-मक्खियों को भगाने के लिए थोड़ी!
ज्योतिपति बातों पर सवार होते कहा,पर हुज़ूर, जब इन्हीं जनमक्खियों को चुनाव में गुड़ सी मिठास लहजों में चुनावी नेता वोट के चक्कर में इनके चारों तरफ मंडराने लगें, और विकास की जादुई जाली से फसाने लगे फिर… ।
ज्वाला — फिर क्या, ज्योतिपति जी! जब जनता को धोखे का अहसास हो, देश की स्थिति बिगड़ती जाए और लोकतंत्र की दिशा बदलती दिखे, तो वह अपने प्रजातंत्र — अपने शहद — को बचाने के लिए स्वयं मधुमक्खी बन जाती है और भिनभिनाकर अपनी आवाज़ उठाती है।
दृश्य 3: मधुमक्खी का डंक और मीठी चुभन
ज्योतिपति: (जोश के साथ) और यही त्रिकोणीय संघर्ष इस देश की असल दास्तान है। सरकार सोचती है कि दूर धकेल देने से आंदोलन का दम घुट जाएगा। लेकिन उन्हें क्या पता कि जनता जब मधुमक्खी बनती है, तो छत्ता हिलाने वालों को छुपने की जगह नहीं मिलती!
ज्वाला सिंह: (जनता की तरफ देखते हुए, एक पैनी मुस्कान के साथ) बेशक! सरकार का डंडा हो, अदालत का कानून हो, या जनता-मीडिया का व्यंग्य—
__मुकाबला तगड़ा है।
कानून के दायरे में रहकर भी सरकार को आईना दिखाना ही असली कला है। इसी को तो कहते हैं—जनता की सरकार /व्यवस्था की मार और जनता की ही चीख पुकार ,यही तो हमारी मीठी चुभन! है!
ला भाई,, दो चाय दे केतली गर्म है ना,।
पृष्ठभूमि में एक पैनी और गूंजती हुई लोक-धुन के साथ दृश्य समाप्त होता है।
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