“देवउठनी एकादशी/देव जागरण/जनचौपाल36″
देवउठनी एकादशी, जिसे देव दिवाली या योग दीपावली भी कहा जाता है, केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि मानव और ईश्वर के पुनर्मिलन का अवसर है। चार महीने पहले देवशयनी एकादशी पर जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में गए थे, तब मानो हमारी चेतना भी शांति में चली गई थी। अब देवउठनी के इस उजले क्षण पर हम फिर से उस परम शक्ति से जुड़ने को तैयार हैं। यही तो योग का सच्चा अर्थ है – मिलन, जुड़ाव और जागरण।
आज तुलसी और शालिग्राम का पवित्र विवाह संपन्न होता है। यह सिर्फ परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति और परमात्मा के संबंध का प्रतीक है। तुलसी प्रकृति की छाया है और शालिग्राम ईश्वर का रूप। जब ये दोनों मिलते हैं, तो सृष्टि एक सामंजस्य का गीत गाती है — जीव, जगत और जगदीश एक सूत्र में बंध जाते हैं।
वर्षा ऋतु के बाद जब काली घटाएं छंटती हैं और सूर्य फिर से धरती को आलोकित करता है, तो यह भी एक तरह का ‘देवउठनी’ ही है। बाहर का आकाश साफ होता है और भीतर का मन भी उजाला पाता है। यही भाव तुलसी विवाह का भी है — आत्मा और ऊर्जा के मिलन से नवप्रेरणा का उदय।
हर घर में तुलसी का रोपण और पूजन केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है। यह संदेश देता है कि प्रकृति ही परमेश्वर का रूप है। अदृश्य, अलौकिक सत्ता से जुड़ने का मार्ग इसी योग से होकर जाता है। जब मनुष्य अपने भीतर शांति और अपने वातावरण में संतुलन बना लेता है, तभी योग दीपावली का असली प्रकाश उसके जीवन में उतरता है।


