बेमेतरा_09/12/2025
कृषि उपज मंडी प्रांगण में चल रही शिव महापुराण कथा में आज स्वामी ज्योतिर्मयानंद सरस्वती जी ने अपने ज्ञानामृत प्रवचनों से बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुजनों को धर्म, गुरु और शिवभक्ति का सार समझाया। कथा की शुरुआत उन्होंने गुरु वंदना से करते हुए कहा कि—
“गुरु ही धर्म से जोड़ते हैं, गुरु ही ज्ञान का प्रकाश देते हैं। बिना गुरु ज्ञान नहीं और बिना गुरु कल्याण नहीं।”
स्वामी जी ने बताया कि भगवान शिव ही सृष्टि के आरंभकर्ता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं। “शिवमय जगत सर्वम्” का अर्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि संसार में जो भी दिखाई देता है, वह शिव की ही प्रेरणा है। उन्होंने पूर्व दिवस की कथा का उल्लेख करते हुए बताया कि पंचभूत—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—स्वयं शिव का स्वरूप हैं, और जो इन तत्वों की पूजा करता है, उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है।
कथा के दौरान ज्योतिर्मयानंद स्वामी जी ने कहा कि शिव महापुराण का पठन पापियों और दुराचारियों को भी शुद्ध कर सकता है, क्योंकि धर्म और ज्ञान ही मनुष्य-जीवन का सच्चा उद्धार करते हैं। अधर्म और गुरु-विरोध को उन्होंने राक्षसी प्रवृत्ति का गुण बताते हुए कहा कि जो माता-पिता, गुरु और धर्म का विरोध करता है, वह पवित्रता से दूर होकर अशुद्धता की ओर जाता है।जो ज्ञान से दूर होता है धर्म से दूर होता है मातापिता और ब्राह्मण का विरोध करता है वह निश्चय ही राक्षस होता है।जो हमेशा धर्म विरूद्ध आचरण कर जगत में पाप फैलाता है यह सब ही राक्षस के गुण है लक्षण है जिसे हम दुर्गुण कह सकते हैं।
उन्होंने बिल्व पत्र और रुद्राक्ष की उत्पत्ति का दिव्य वर्णन किया—
बिल्व पत्र माता पार्वती के पसीने की बूंदों से उत्पन्न माना जाता है और शिव-पार्वती को अत्यंत प्रिय है।रुद्राक्ष का जन्म भगवान शिव के ततोपरांत बहाए गए अश्रुओं से हुआ, जिसे शिव का ही स्वरूप माना जाता है।
स्वामी जी ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा रखने वाले भक्तों को सवा लाख पार्थिव शिवलिंग स्थापना का विधान भी बताया।
कथा के अंत में आज बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी उपस्थित हुए और भंडारे का प्रसाद ग्रहण किया। आयोजन समिति और सदस्य और स्वामी जी की टीम निरंतर व्यवस्था में सहयोग दे रही है।


