रायपुर, 8 नवंबर 2026
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हसदेव-बांगो (मिनीमाता बांगो) नहर परियोजना के लिए अधिग्रहित ऐसी जमीन को वापस लौटाने की मांग खारिज कर दी है, जिसका उपयोग परियोजना में नहीं हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल जमीन का उपयोग नहीं होना ही उसे पूर्व भूमि स्वामियों को वापस पाने का कानूनी अधिकार नहीं देता।
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने 5 नवंबर को दोनों संबंधित याचिकाओं पर साझा आदेश पारित किया। यह मामला रायगढ़ जिले के खरसिया क्षेत्र के एक परिवार की कृषि भूमि से जुड़ा था। परिवार की ब्रह्मनपाली गांव स्थित कुल 0.954 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण वर्ष 2004 में किया गया था।
20 साल पुराने भूमि अधिग्रहण का मामला
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि नहर परियोजना पूरी हुए एक दशक से अधिक समय बीत चुका है और अधिग्रहित जमीन के कुछ हिस्सों का उपयोग नहीं किया गया। उन्होंने जमीन वापस दिलाने के लिए प्रशासन के समक्ष आवेदन किया था, लेकिन कलेक्टर रायगढ़ ने 27 सितंबर 2021 को उनकी मांग खारिज कर दी थी।
इसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं ने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत अप्रयुक्त जमीन वापस करने के प्रावधान का हवाला दिया।
सरकार ने रखी रखरखाव की जरूरत
सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि नहर के दोनों किनारों पर निरीक्षण, रखरखाव और निगरानी के लिए जमीन की आवश्यकता है। भविष्य में वहां स्टोर रूम, कार्यालय और अन्य जरूरी सुविधाएं भी विकसित की जा सकती हैं।
अदालत ने क्यों खारिज की याचिकाएं?
हाईकोर्ट ने माना कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 के तहत अधिग्रहित जमीन पर 2013 के नए कानून की धारा 101 को स्वतः लागू नहीं किया जा सकता। अदालत ने दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मामले का व्यापक महत्व
यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां पुरानी सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित जमीन के उपयोग और स्वामित्व को लेकर विवाद सामने आते हैं। इसमें भूमि अधिग्रहण, किसानों के अधिकार और सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए जमीन की आवश्यकता के बीच कानूनी अंतर को समझने का अवसर मिलता है।
