“रूस तेल विवाद के बीच ट्रंप का यू-टर्न: बोले, पीएम मोदी मेरे बहुत करीबी दोस्त””भारत पर नरम, यूरोप-चीन पर बरसे ट्रंप: मोदी संग रिश्तों की दी मिसाल”।
नई दिल्ली। 19/09/2025
रूस से तेल खरीद को लेकर लंबे समय से आलोचना कर रहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अब अपना रुख नरम कर लिया है। यूरोपीय देशों और चीन पर सख्त रुख अपनाने वाले ट्रंप ने भारत को निशाना बनाने के बजाय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपनी करीबी दोस्ती पर जोर दिया है।
“भारत और पीएम मोदी के बेहद करीब…” रूस तेल विवाद के बीच बदले ट्रंप के सुर
ब्रिटेन दौरे के दौरान पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा—
“मैं भारत के बहुत करीब हूं। मैं भारत के प्रधानमंत्री मोदी के बहुत करीब हूं। मैंने हाल ही में उनसे बात की थी और जन्मदिन की शुभकामनाएं भी दी थीं। हमारे रिश्ते बेहद मजबूत हैं।”
भारत को लेकर नरमी, यूरोप पर बरसे ट्रंप।
ट्रंप ने साफ कहा कि यूरोपीय देश अब भी रूस से तेल खरीद रहे हैं, जिससे रूस को अलग-थलग करने की अमेरिकी कोशिश कमजोर पड़ रही है।
उन्होंने आरोप लगाया—“मैंने उन पर पहले ही प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन वे अब भी रूस से तेल ले रहे हैं। चीन हम पर भारी टैरिफ दे रहा है, और मैं उस पर और सख्त कदम उठाने को तैयार हूं। मगर जब हमारे सहयोगी ही रूस से तेल खरीदते रहें तो संघर्ष का हल मुश्किल हो जाता है।”
ट्रंप का मानना है कि वैश्विक तेल कीमतें कम करना ही रूस को समझौते के लिए मजबूर करने का सबसे कारगर तरीका है।
यूके यात्रा और अहम समझौते।
डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के निमंत्रण पर ब्रिटेन दौरे पर हैं। चेकर्स में मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने यूएस-यूके विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी समझौते पर हस्ताक्षर किए। इस यात्रा में किंग चार्ल्स तृतीय और क्वीन कैमिला ने भी विंडसर कैसल में उनका भव्य स्वागत किया।
भारत-पाकिस्तान विवाद का जिक्र पुनः
ट्रंप ने एक बार फिर दावा किया कि उनके हस्तक्षेप से इस साल भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित जंग टल गई।
“हमने कहा कि अगर आप हमारे साथ व्यापार करना चाहते हैं तो आपको साथ आना होगा। इस रणनीति से हमने भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव को रोकने में सफलता पाई।”
बदलते सुर का क्या मतलब?
विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर दबाव बनाने के बजाय ट्रंप अब मोदी के साथ दोस्ती को आगे रखकर अमेरिका-भारत संबंधों को मजबूती देना चाहते हैं। वहीं यूरोपीय देशों और चीन पर उनकी आलोचना संकेत देती है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी विदेश नीति का फोकस इन्हीं मोर्चों पर रहेगा।


