ज्योतिपति सोच रहा था कहीं रसोई की आग में उसका पूरा वजूद खत्म न हो जाए,उसको अब भुक्तभोगी जनता का समग्र संसार दिखने लगा। जन चौपाल 36 /चौपाल से चौपाटी तक
डिजिटल डेस्क_03/02/2026
ज्योतिपति घर आया तो चाय पीने की इच्छा जताई। पत्नी उनसे भिड़ने को तैयार थी।आज के दौर में जब बाज़ार की कीमतें आसमान छू रही हैं, कुछ लिखोगे इस पर?!बाहर चाय 20 रुपए चटनी समोसे 40 रुपए ढंग की खाने की थाली 250 रुपए।
‘ज्योतिपति‘ (आम नागरिक) अपने खाली होते बटुए को देखकर गहरी चिंता में है। उसे समझ नहीं आ रहा कि थाली की यह दाल और सब्जियों की कीमतें किसी आर्थिक नीति का परिणाम हैं या फिर इसके पीछे बाज़ार की कोई छिपी हुई ‘ज्वाला’ काम कर रही है।
सदन से सड़क तक की हलचल:
हाल ही में जब सदन में कीमतों पर चर्चा हुई, तो ‘जनता की आवाज़ के प्रतिनिधि’ (विपक्ष) ने खाली सिलेंडरों का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि क्या “आम आदमी के पसीने की कमाई” सिर्फ आंकड़ों का खेल बनकर रह गई है?
वहीं, ‘देश की तिजोरी के रखवाले‘ (वित्त मंत्री/सरकार) ने तर्क दिया कि वैश्विक परिस्थितियों और ‘बाहरी तूफानों’ की वजह से कीमतें प्रभावित हुई हैं। उनका दावा है कि वे हर संभव कोशिश कर रहे हैं ताकि घर के बजट को संतुलित रखा जा सके।
ज्योतिपति का नजरिया:
ज्योतिपति सोच रहा है कि जब ‘घर के बड़े मुखिया‘ और ‘तिजोरी के रखवाले’ आपसी बहस में उलझे होते हैं, तब ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। उसे डर है कि कहीं यह आर्थिक असमानता की ‘ज्वाला’ उसके बच्चों के भविष्य को प्रभावित न कर दे।
निष्कर्ष:
अब सवाल यह है कि क्या ‘घर के मुखिया‘ कोई ऐसा ठोस कदम उठाएंगे जिससे रसोई की आग शांत हो सके और ज्योति पति के चेहरे पर मुस्कान लौट आए? यह केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि भरोसे का सवाल है।


