संपादकीय खबर/भारत और इथियोपिया
18/12/2025
अदीस अबाबा/नई दिल्ली: भारतीय संस्कृति में प्रकृति को परमेश्वर का रूप माना गया है। यहाँ नदी, पर्वत और धरती केवल संसाधन नहीं, बल्कि पूजनीय सत्ताएँ हैं। यह गहरी आस्था इस मूल सत्य पर टिकी है कि ‘वंदे मातरम’ केवल एक गीत नहीं, बल्कि सृष्टि के आधार—मातृशक्ति—की वंदना है। हाल ही में इथियोपिया की धरती पर जब वंदे मातरम की गूंज सुनाई दी, तो उसने सिद्ध कर दिया कि मातृ-भक्ति का भाव भौगोलिक सीमाओं से परे है।
मातृशक्ति: सृष्टि का आदि और अंत
दुनिया के तमाम धर्मों और विचारधाराओं के केंद्र में चाहे कोई भी महापुरुष रहा हो, लेकिन सत्य यही है कि हर महापुरुष को जन्म देने वाली एक नारी, एक ‘माँ’ ही रही है। भारतीय दर्शन स्पष्ट करता है कि बिना माँ के संतान संभव नहीं और बिना मातृभूमि के अस्तित्व नहीं। जैसा बीज होगा, वैसी ही निष्पत्ति होगी—”यथा बीजम् तथा निष्पत्ति”। जब हम धरती को ‘माँ’ के रूप में देखना शुरू करते हैं, तभी ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की सच्ची भावना जागृत होती है।
इथियोपिया में सांस्कृतिक संगम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इथियोपिया दौरे के दौरान एक ऐतिहासिक दृश्य उभरा। प्रधानमंत्री अबी अहमद अली द्वारा आयोजित भोज में इथियोपियाई कलाकारों ने जब ‘वंदे मातरम’ के स्वर छेड़े, तो पूरा माहौल भावुक हो गया। वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर विदेशी धरती पर यह गायन वैश्विक एकता का प्रतीक बना। पीएम मोदी ने इस पल को साझा करते हुए इसे अत्यंत भावुक बताया। उन्होंने ‘एक पेड़ माँ के नाम’ मुहिम के तहत पौधा लगाकर प्रकृति और संस्कृति के अंतर्संबंधों को और मजबूती दी।
साझा विरासत और भविष्य
इथियोपियाई संसद में पीएम मोदी ने रेखांकित किया कि भारत का राष्ट्रीय गीत और इथियोपिया का राष्ट्रगान दोनों ही अपनी भूमि को ‘माँ’ कहकर संबोधित करते हैं। यह साझा मूल्य ही भारत-इथियोपिया संबंधों की नींव है। ग्लोबल साउथ की आवाज बनने से लेकर आर्थिक सहयोग तक, दोनों देश आज कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। जिस दिन पूरी दुनिया इस मातृ-भाव को समझ लेगी, उस दिन द्वेष समाप्त होगा और केवल नमन का भाव शेष रहेगा।


