हम केवल जीवन के बारे में सोचें”? बस जीवन के आनंद के बारे में सोचें”? पर मोक्ष के बारे में बिल्कुल ना सोचे तो यह एक गहन विषाद का विषय हो सकता है:
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“हर आत्मा परमात्मा का अंश है, और हर व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी है।”
शास्त्रों और धर्मग्रंथों में स्पष्ट उल्लेख है कि परम ज्ञान और मोक्ष किसी विशेष जाति, वर्ग, लिंग या अधिकार-प्राप्त व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है। यह प्रत्येक जीव के लिए जन्मसिद्ध अधिकार है। यह अधिकार किसी के पढ़ने, न पढ़ने, जानने या न जानने पर निर्भर नहीं करता।
सत्य का साक्षात्कार किसी विवाद, बहस या बौद्धिक जीत से नहीं होता। जब मनुष्य के पास भाषा नहीं थी, अक्षर ज्ञान नहीं था, तब भी वह परमात्मा के करीब था। तब आत्मा सीधे परमात्मा को पुकारती थी, और परमात्मा आत्मा की पुकार सुनकर उसे उत्तर देता था।
आत्मा, परमात्मा का अंश है — और इसीलिए आत्मा ही परमात्मा की आवाज को पहचान सकती है।
शास्त्रों में कई उदाहरण मिलते हैं —
गजेंद्र मोक्ष में हाथी की पुकार सुनकर विष्णु अवतरित हुए।
छोटे पक्षी के बच्चों की रक्षा के लिए भी परमात्मा की लीला प्रकट हुई।
युद्धभूमि में भी धर्म की रक्षा हेतु दिव्य संकल्प प्रकट हुआ।
हम न कर्ता हैं, न संहर्ता। जब हमने किसी को उत्पन्न नहीं किया, तो हमें किसी का विनाश करने का अधिकार कैसे हो सकता है?
आज का मनुष्य “कर्ता” होने का अहंकार पाल रहा है, और यही उसे विनाश की ओर ले जा रहा है।
सच्चाई यह है —
हम न कर्म हैं,
न करने वाले हैं,
न ही फल देने वाले हैं।
हम केवल माध्यम हैं — वह भी उसी परम सत्ता के हाथों में।
कर्तृत्व का भाव केवल उसी का है।
हमारी प्रवृत्तियाँ भी दो प्रकार की होती हैं —
सत्प्रवृत्ति (प्रकाश) — जिसमें सज्जन दिन में जागते हैं और धर्म का पालन करते हैं।
दुष्प्रवृत्ति (अंधकार) — जिसमें दुर्जन रात में सक्रिय रहते हैं, जैसे उल्लू अंधेरे में जागता है।
जिस दिन हम कर्ता होने का मोह छोड़ देंगे, उसी दिन मोक्ष के मार्ग पर पहला कदम रख देंगे।
क्योंकि कर्ता वही है जो सृष्टि का भी है और संहार का भी — और वही परमात्मा है।(दीपक पाण्डेय)


