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Saturday, March 7, 2026

4था भाग /भगवान की माया_ बाढ़ की त्रासदी और आत्मबोध_

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“क्या जो कुछ हम वर्षों में कमाते हैं, वह एक क्षण में माया बनकर बह नहीं सकता?”
“क्या हमारी संपूर्ण यात्रा केवल एक परीक्षा है?”
“क्या सत्य वहीं खड़ा रहता है, जबकि हम भ्रम में भटकते हैं

भाग 3 की कहानी के आगे भगवान की माया” कथा का भाग 4, जो सबसे भावनात्मक, विस्फोटक और आत्मबोध से भरा भाग है। यहाँ पाठक केवल नारद जी ही नहीं, अपने जीवन के सच को भी अनुभव करेंगे।

🌱🌿हरियाली लहलहा रही थी।
खेतों में फसलें झूम रही थीं।
बच्चों की हँसी, पत्नी की ममता और घर की सम्पन्नता — नारद जी को लगता था अब जीवन में क्या शेष है?
परंतु…
संसार का यह सुख स्थायी नहीं होता।
जो सबसे सुंदर लगता है, अक्सर वहीं से विछोह आरंभ होता है।
🌩️ एक दिन वर्षा शुरू हुई… और रुकने का नाम नहीं लिया।
तीन दिन, चार दिन, फिर सात दिन…
बादलों की गड़गड़ाहट, बिजली की कड़क, और मूसलाधार वर्षा ने ग्रामवासियों को डरा दिया।
गांव के पास की नदी अब उफान पर थी।
धीरे-धीरे उसका पानी किनारों को तोड़कर गांव में घुस आया।
कच्चे-पक्के घर ढहने लगे।
लोगों की चीख-पुकार, पशुओं का बह जाना, बच्चों का रोना —
गांव अब त्रासदी का मैदान बन चुका था।

🏚️ नारद जी का टूटता संसार

नारद जी ने अपने घर के बचे-खुचे सामान को एक गठरी में बाँधा।
एक हाथ में पत्नी का हाथ, दूसरे में बच्चे को थामा।
पत्नी ने एक बच्चे को गोद में लिया, एक का हाथ पकड़ा।
वे पानी से भरे रास्तों में धीरे-धीरे बढ़ने लगे —
पानी गहराता जा रहा था, बहाव तेज हो रहा था।
फिर…
🌀 एक गड्ढे में पैर फिसला —
गठरी बह गई।

नारद ने कहा – “कोई बात नहीं, फिर से कमा लेंगे।”
थोड़ा और आगे बढ़े, पत्नी गड्ढे में फिसली —
गोद का बच्चा बह गया…
पत्नी बिलखने लगी।
पर क्या हो सकता था?
आगे बढ़े — एक और बच्चा बह गया…
फिर एक और…
अब नारद जी और उनकी पत्नी केवल एक-दूसरे का हाथ थामे बचे थे।
रोते-कलपते, वे किसी ऊँचे स्थान की ओर बढ़ रहे थे।
फिर…

💔 एक और गड्ढा… और पत्नी भी बह गई।

नारद जी किसी तरह बाहर निकले,
लेकिन… वह अब अकेले थे।
उनकी आँखों के सामने —
पूरा जीवन, पूरा परिवार, सबकुछ… बह चुका था।

😭 मौन, शोक और माया का अंत

वह रो रहे थे।
धारा के बीच अकेले, थके हुए, टूटी हुई सांसों के साथ।
उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था।
किसे कोसें? भाग्य को? प्रकृति को? भगवान को?
पर तभी…

एक प्रकाश उनके मस्तिष्क में चमका।

“अरे! मैं क्यों आया था? किसके लिए जल लेने गया था?”

“प्रभु! विष्णु! वे तो मेरी प्रतीक्षा कर रहे होंगे!”
“मैं जल लेने आया था, और वर्षों इस माया में फंस गया!”
यह सोचते ही —
बाढ़ समाप्त हो गई।
गांव अदृश्य हो गया।
सब कुछ लौट गया।
वे अकेले — उसी वन में खड़े थे — उसी वृक्ष के पास…

🌳 वहां… प्रभु बैठे थे। मुस्कराते हुए।

“अरे भाई नारद! कहां चले गए थे? पानी लाए कि नहीं?”
नारद जी उनके चरणों में गिर पड़े।
रोते रहे…
कुछ बोल ही नहीं पाए…
वो वर्षों की कथा — प्रभु के लिए क्षण मात्र थी

शेष अंतिम भाग कल

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