सत्ता और परंपरा का द्वंद्व_जब कोई बेटा बाप से पूछे आपकी हैसियत क्या है पहचान क्या है??जन चौपाल 36 चौपाल से चौपाटी तक ।
आलेख | 29 जनवरी, 2026
हमने पढ़ा है कि एक बार रणभूमि में भगवान परशुराम और पितामह भीष्म का आमना-सामना हुआ। भीष्म युद्धकला में परशुराम के ही शिष्य थे। परशुराम ने कहा— “भीष्म, तुम रणभूमि छोड़ दो क्योंकि तुम गंगा पुत्र हो और तुम्हारे पास इच्छा मृत्यु का वरदान है।” यह प्रसंग याद दिलाता है कि जब गुरु और शिष्य, या परंपरा और शक्ति आमने-सामने होते हैं, तो विजय केवल शस्त्रों की नहीं, बल्कि मर्यादाओं की होनी चाहिए।
आज माघ मेले के तट पर भी कुछ ऐसा ही दृश्य उभरा है। क्या अब देश में सनातन धर्म की नई परिभाषा लिखी जाएगी? विडंबना देखिए, जिस प्रशासन का कार्य व्यवस्था संभालना है, वह आध्यात्मिक शिखर के प्रतीक ‘शंकराचार्य’ से उनकी पहचान का साक्ष्य मांग रहा है। यह वैसा ही है जैसे कोई बच्चा बड़ा होकर पिता से पूछे कि ‘आपकी हैसियत क्या है?’
सत्ता और परंपरा का द्वंद्व
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का माघ मेला क्षेत्र छोड़ना केवल एक संत का प्रस्थान नहीं, बल्कि सत्ता के अहंकार और अध्यात्म की मर्यादा के बीच के टकराव का संकेत है। स्वामी जी के वक्तव्यों ने वर्तमान प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े कर दिए हैं। सूबे के मुखिया और प्रशासन की इस विषय पर चुप्पी ने उस पीड़ा को और गहरा किया है, जो एक सन्यासी ने मौनी अमावस्या जैसे पावन पर्व पर गंगा स्नान से वंचित रहकर झेली है।
अस्तित्व का प्रश्न
उनके आरोप गंभीर हैं—प्राचीन मंदिरों की स्थिति और सनातनी संस्कारों पर ‘कथित’ सुनियोजित प्रहार। यदि आज सत्ता के गलियारे और वैधानिक संस्थाएं यह तय करने लगेंगी कि ‘हिंदू’ कौन है, तो आने वाली पीढ़ियां एक स्वतंत्र और शाश्वत सनातन के बजाय एक ‘संयोजित व्यवस्था’ को विरासत में पाएंगी।
धर्म एक परंपरा है और राजनीति एक बिसात; जहाँ एक तरफ अटूट आस्था है, तो दूसरी तरफ सत्ता की बिछी चालें। फैसला अब समाज को करना है कि वह ‘शाश्वत’ के साथ खड़ा है या ‘सामयिक’ के साथ।
अब यहां पर परशुराम कौन है और भीष्म कौन है यह एक यक्ष प्रश्न है??
डिस्क्लेमर: प्रस्तुत लेख लेखक के निजी विचार और उपलब्ध तथ्यों के विश्लेषण पर आधारित है, जिसका उद्देश्य किसी की मानहानि या किसी संस्था की अवमानना करना नहीं है।


