मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ ने अपनाई लचीली सोच, परंपरा और परिवर्तन का संतुलन बना।परंपरा और आधुनिकता के संगम से संघ को दी नई दिशा, शताब्दी वर्ष से पहले दिखाया परिवर्तन का मार्ग।
नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपनी शताब्दी वर्ष के करीब पहुँच चुका है। 1925 से शुरू हुई यह यात्रा न सिर्फ संगठनात्मक विस्तार की रही, बल्कि वैचारिक परिवर्तन की भी रही है। इस परिवर्तन की सबसे बड़ी धुरी बने हैं वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत।
बदलाव की राह मोहन भागवत और संघ की यात्रा
मोहन भागवत जी का कार्यकाल आरएसएस की 100 साल की यात्रा में सबसे परिवर्तनकारी काल माना जाएगा।
शिक्षा वर्ग से समाज के हर तबके तक संवाद, सामाजिक सरोकारों पर बढ़ता जोर।
संघ की पारंपरिक छवि और कार्यशैली को आधुनिक समय की जरूरतों के अनुरूप ढालने का श्रेय काफी हद तक भागवत को जाता है। उन्होंने अपने कार्यकाल में संघ शिक्षा वर्ग से लेकर समाज के विभिन्न वर्गों तक संवाद और समावेश का रास्ता अपनाया। भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ किसी एक वर्ग का संगठन न होकर पूरे समाज का है और समय के साथ-साथ विचारों का लचीलापन ही संगठन को जीवंत बनाए रखता है।
सामाजिक सरोकारों पर जोर
पिछले वर्षों में देश में चले जन-आंदोलनों, जैसे स्वच्छ भारत मिशन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ या पर्यावरण संरक्षण अभियानों से संघ ने स्वयं को सीधे जोड़ा। यही नहीं, गौ-आंदोलन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी संघ की भूमिका को अधिक संतुलित और व्यापक बनाया गया। भागवत ने कट्टरता की बजाय संवाद की नीति अपनाकर संघ को जनसामान्य में अधिक स्वीकार्य बनाया।
राजनीतिक प्रभाव
यह सर्वविदित है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) की राजनीति और विचारधारा की जड़ों में संघ का योगदान अहम है। भागवत के नेतृत्व में संघ ने राजनीति से सीधे दूरी बनाए रखते हुए भी यह सुनिश्चित किया कि राष्ट्रहित सर्वोपरि रहे। यही कारण है कि आज के दौर में संघ का प्रभाव न केवल संगठनात्मक रूप से बढ़ा है, बल्कि सामाजिक चेतना में भी उसकी पकड़ मजबूत हुई है।
भविष्य की दिशा
संघ के शताब्दी वर्ष तक पहुँचने से पहले भागवत यह संदेश दे चुके हैं कि संगठन को समयानुकूल बनाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है। शिक्षा, संस्कृति, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करके उन्होंने संघ को 21वीं सदी की जरूरतों के अनुरूप ढालने का प्रयास किया है।
कुल मिलाकर, मोहन भागवत का कार्यकाल संघ की उस यात्रा का प्रतीक है जिसमें परंपरा और परिवर्तन का संतुलन एक साथ दिखाई देता है। वे न सिर्फ संगठनात्मक दृष्टि से बल्कि वैचारिक स्तर पर भी “परिवर्तन पुरुष” के रूप में उभरे हैं।


