राष्ट्रीय खबर /जम्मू कश्मीर/ 10/12/2025
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी—“भारत में घुसपैठियों के लिए किसी तरह का रेड-कार्पेट वेलकम नहीं होना चाहिए”—के बावजूद जम्मू में रोहिंग्या समुदाय की उपस्थिति तेजी से स्थायी स्वरूप लेती जा रही है।
नरवाल, सुंजवां और भटिंडी जैसे संवेदनशील इलाकों में रोहिंग्या परिवारों ने अब न सिर्फ झुग्गियों का विस्तार किया है, बल्कि स्थायी बस्तियाँ, छोटी दुकानें, बाजार और मदरसे तक खड़े कर लिए हैं। यह स्थिति सुरक्षा एजेंसियों और स्थानीय प्रशासन के लिए गंभीर चुनौती बनकर सामने आई है।
ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, पहले रोहिंग्या समुदाय अस्थायी कैम्पों तक सीमित था, लेकिन 2007 के बाद इनकी संख्या बड़े स्तर पर बढ़ने लगी। 2009 के बाद तो इनकी मौजूदगी में अचानक तेज उछाल आया। 1994 में दो बच्चों सहित एक रोहिंग्या परिवार के आगमन से शुरू हुई यह कहानी अब हजारों तक पहुँच चुकी है। कासिम नगर के नाम से पहचाना जाने वाला क्षेत्र आज ‘रोहिंग्या बस्ती’ और बाद में ‘बर्मा बस्ती’ के रूप में जाना जाने लगा है, जो उनके बढ़ते प्रभाव और स्थायी पहचान की तलाश को दर्शाता है।
चौंकाने वाली बात यह है कि कुछ रोहिंग्या न केवल स्थानीय स्कूलों में दाख़िला ले चुके हैं, बल्कि शिक्षकीय पदों तक पहुँच गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रोहिंग्या मूल का एक व्यक्ति—सादिक—स्कूल में शिक्षक के रूप में बच्चों को पढ़ा रहा है। वहीं, रोहिंग्या बच्चों के लिए अलग से मदरसे भी संचालित हो रहे हैं, जिस पर सुरक्षा एजेंसियां समय-समय पर निगरानी बढ़ाती रहती हैं। आर्थिक मोर्चे पर भी ये समुदाय कबाड़, मजदूरी, रेहड़ी-फड़ी और कपड़ों की छोटी दुकानों के जरिए स्थानीय अर्थव्यवस्था में पैठ बना रहा है।
इनकी बढ़ती संख्या ने जनसांख्यिकीय बदलाव, अवैध दस्तावेजों और सुरक्षा जोखिमों को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। कई सत्यापन अभियानों में फर्जी पहचान पत्र, संदिग्ध दस्तावेज़ और अवैध बसावट के मामले पकड़े गए।
जम्मू जैसे संवेदनशील बॉर्डर क्षेत्र में रोहिंग्या की यह स्थायी होती मौजूदगी, सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और जमीनी हकीकत के बीच के गहरे विरोधाभास को उजागर करती है—जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बेहद गंभीर चिंता बन चुकी है।


