बेमेतरा, 01/10/ 2026
जनता की आंखों में सब दिखता है। सबसे ज्वलंत सवाल यह है कि यदि देश वाकई विकास कर रहा है, तो ‘रेवड़ी संस्कृति’ (Freebies) की जरूरत क्यों पड़ रही है?
शिक्षा बनाम रोजगार
आज शिक्षा इतनी महंगी है कि वह निवेश नहीं, बल्कि कर्ज बन गई है। डिग्री हाथ में है, पर हुनर और रोजगार का उससे कोई तालमेल नहीं है।
जब स्कूल बंद होते हैं और शिक्षकों को ‘एडजस्ट’ (समायोजित) किया जाता है, तो असल में उस क्षेत्र का भविष्य अंधेरे में धकेला जाता है। सरकारी तर्क अक्सर ‘छात्रों की कम संख्या’ का होता है, लेकिन सवाल यह है कि संख्या कम क्यों हुई? क्या इसलिए कि सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता को निजी स्कूलों की चकाचौंध के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया गया?
वोट बैंक का गणित
जब सरकारें रोजगार देने में विफल होती हैं, तो वे ‘मुफ्त योजनाओं’ का झुनझुना थमा देती हैं। यह विकास नहीं, बल्कि जनता की सोच को ‘दकियानूसी और निर्भर’ बनाए रखने की साजिश है।
वोट देने वाली उंगलियां दिखती हैं, पर काम मांगने वाले हाथ नहीं दिखते।
‘शराब’ बनाम ‘संस्कार’
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में, जहाँ सामाजिक ताना-बना बहुत संवेदनशील है, वहां सरकार का शराब बेचने में ‘मशगूल’ होना एक विरोधाभासी स्थिति पैदा करता है। एक उंगली शिक्षा मांग रही है, तो सरकार उसे नशा परोस रही है। यह न केवल आर्थिक शोषण है, बल्कि आने वाली पीढ़ी के ‘मानसिक विकास’ को रोकने का तरीका भी है।
विकास का विरोधाभास
आज देश में ‘गति’ और ‘शक्ति’ जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम हो रहा है। हाईवे और एक्सप्रेस-वे बन रहे हैं, लेकिन ‘ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स’ (HDI) में हम अब भी पीछे हैं।
सच्चाई यह है कि इस चकाचौंध का लाभ ऊपरी 10-15% आबादी उठा रही है, जबकि शेष आबादी केवल उस चकाचौंध को देख रही है, जी नहीं रही।


