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Saturday, March 7, 2026

नेपाल का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य: युवाओं की बेचैनी और लोकतंत्र की चुनौती

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सरकारें जब जनता के प्रति जवाबदेह नहीं रह पाती और निर्णय प्रक्रियाएँ अपारदर्शी होने लगती हैं, तो नागरिकों का विश्वास कम हो जाता है।

नेपाल/काठमांडू:_न्यूज आर्टिकल लेख
नेपाल, जो हिमालय की गोद में बसा एक छोटा लेकिन सांस्कृतिक रूप से समृद्ध देश है, आज फिर से राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। लोकतंत्र की स्थापना को लगभग डेढ़ दशक हो चुके हैं, लेकिन जनता खासकर युवा वर्ग का विश्वास लगातार कम होता जा रहा है।

लोकतंत्र की यात्रा और अस्थिरता
2008 में नेपाल ने 240 साल पुरानी राजशाही को समाप्त कर लोकतांत्रिक गणराज्य की शुरुआत की थी। संविधान सभा का चुनाव हुआ, नया संविधान 2015 में लागू किया गया और लोकतंत्र की नींव मजबूत करने का प्रयास किया गया। लेकिन विगत वर्षों में राजनीतिक अस्थिरता इतनी बढ़ी कि अब तक तेरह बार सरकारें बदली जा चुकी हैं। कोई भी सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई, जिससे जनता का भरोसा डगमगाने लगा।

युवाओं का गुस्सा और सड़कों पर विरोध
नेपाल की नई पीढ़ी, जो शिक्षा और तकनीक से अधिक जुड़ी है, यह देख रही है कि राजनीतिक नेतृत्व बार-बार उन्हीं पुराने चेहरों के बीच घूम रहा है। सत्ता के इस चक्र में न तो नीतियों की निरंतरता है और न ही जनता की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब। यही कारण है कि हाल के वर्षों में युवाओं ने बड़े पैमाने पर प्रदर्शन शुरू किए और राजनीतिक दलों को उनसे दूर रहने की सलाह दी। उनका मानना है कि सत्ता का खेल केवल नेताओं के बीच सिमटकर रह गया है।

सत्ता का केंद्रीकरण और लोकतांत्रिक संकट
नेपाल की राजनीति अक्सर कुछ प्रमुख नेताओं – शेर बहादुर देउबा, पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ और केपी शर्मा ओली – के इर्दगिर्द घूमती रही है। सत्ता हासिल करने के लिए आपसी समर्थन और गठजोड़ का सिलसिला जनता को यह सोचने पर मजबूर करता है कि उनकी वोट की असली कीमत क्या है। वहीं सत्ता के केंद्रीकरण, संसद भंग करने की कोशिशों और विपक्ष को कमजोर करने की रणनीतियों ने लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती पर सवाल खड़े किए हैं।

भविष्य की राह
नेपाल के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने लोकतंत्र को स्थिरता और पारदर्शिता प्रदान कर सके। जनता, विशेषकर युवा वर्ग, केवल नारों से संतुष्ट नहीं है; वे जवाबदेही और सहभागिता चाहते हैं। यदि राजनीतिक दल इस संदेश को नहीं समझ पाए, तो लोकतंत्र के प्रति बढ़ती निराशा और असंतोष भविष्य में और गंभीर संकट का कारण बन सकता है।

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