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Saturday, March 7, 2026

रूस-यूक्रेन संघर्ष को कई विश्लेषक नाटो बनाम ब्रिक्स के उभरते शक्ति-संतुलन के संदर्भ में देखते हैं।”

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शक्ति प्रदर्शन, विज्ञान का मिथ्याभिमान और मानवता के सामने खड़ा वैश्विक संकट।विकास, शक्ति और विनाश : सभ्यता किस दिशा में जा रही है?

वैश्विक हालात:_07/01/2026

सत्य कभी किसी गलत का समर्थन नहीं करता। आज की वैश्विक परिस्थितियों को देखकर यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या विश्व एक और महायुद्ध की ओर बढ़ रहा है? यदि हाँ, तो इसका कारण क्या है—मानवता की रक्षा या शक्ति का प्रदर्शन?
महाभारत में अर्जुन युद्धभूमि में खड़े होकर कृष्ण से पूछते हैं—
“हे माधव, इन अपने ही लोगों से युद्ध करके मुझे क्या मिलेगा?”
यह प्रश्न केवल अर्जुन का नहीं था, यह हर युग में चेतन मनुष्य का प्रश्न रहा है। युद्ध के सामने खड़ा विवेक यही पूछता है कि हर विकास का अंतिम परिणाम क्या वास्तव में विनाश ही है?

आज लगभग सभी बड़े राष्ट्र परमाणु शक्ति संपन्न हो चुके हैं या होने की दौड़ में हैं। शक्ति का स्वभाव है—वह स्वयं को सिद्ध करना चाहती है। जहाँ शक्ति है, वहाँ शक्ति-प्रदर्शन होगा। जब सभी शक्तिशाली होंगे, तो एक-दूसरे की ताकत परखने के लिए संघर्ष भी होगा। यही स्थिति विश्व को युद्ध की ओर ले जाती है।
यह स्पष्ट होता जा रहा है कि आधुनिक युद्ध मानवता का नहीं, शक्ति का उत्सव बन चुका है।

महाभारत : पहला विश्वयुद्ध?
हम महाभारत को केवल एक धार्मिक ग्रंथ मानकर पढ़ते हैं, जबकि वह एक ऐतिहासिक चेतावनी भी है। ग्यारह अक्षौहिणी सेना कौरवों की, सात पांडवों की—अनगिनत राजा, अनगिनत सैनिक। दिव्यास्त्रों का प्रयोग हुआ, और अंततः क्या बचा?
एक सुनसान धरती, विध्वंस और पश्चाताप।
वह युद्ध अपने समय का विश्वयुद्ध था। आज के परमाणु अस्त्र उसी दिव्यास्त्रों का आधुनिक रूप हैं। अंतर केवल इतना है कि अब विनाश कहीं अधिक त्वरित और सर्वव्यापी होगा।

भारत और गुटनिरपेक्षता
भारत की परंपरा रही है—गुटनिरपेक्षता। यह कायरता नहीं, बल्कि ऐतिहासिक बोध है। हमने देखा है कि युद्ध में सबसे अधिक हानि मानवता की होती है। इसलिए भारत का दर्शन कहता है—
“अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तदैव च।”
अर्थात् शक्ति आवश्यक है, लेकिन केवल आत्मरक्षा के लिए—प्रदर्शन के लिए नहीं।
आज हमारे देश के सामने असली युद्ध बेरोज़गारी, भूख, जनसंख्या, जल संकट और बेहतर जीवन के अभाव से है। इनसे लड़ने के लिए परमाणु बम नहीं, विवेक चाहिए।

विज्ञान, ज्ञान और अज्ञान
हम गर्व से कहते हैं कि हम ज्ञानी हैं, वैज्ञानिक युग में जी रहे हैं। पर सच यह है कि हम ज्ञान के उपभोक्ता हैं, ज्ञानी नहीं
जो ज्ञान हम अपनाते हैं, वह किसी और की लिखी, कही या खोजी हुई बात है। हम अनुयायी हैं, स्रष्टा नहीं।
विडंबना यह है कि जो स्वयं को सबसे बड़ा ज्ञानी मानता है, वही सबसे बड़ा अज्ञानी होता है।

आज विज्ञान अपने चरम पर है, लेकिन उसके साथ मिथ्याभिमान भी जुड़ गया है। हम विज्ञान को साधन नहीं, सत्ता बना चुके हैं। मोबाइल, टीवी, आरओ जल—हर जगह विज्ञान है, पर विवेक नहीं।
हम धरती से अंधाधुंध पानी निकाल रहे हैं, जल संकट खड़ा कर रहे हैं।
“हो गया बिन पानी सब सूना…”—यह पंक्ति अब भविष्य नहीं, वर्तमान बन चुकी है।

प्रकृति, शक्ति और भ्रम
हम प्राकृतिक संपदा को अकूत मानकर उस पर अधिकार जताते हैं, जबकि प्रकृति न तो अकूत है, न किसी की संपत्ति। वह संतुलन के लिए है, दोहन के लिए नहीं।
आज श्रेष्ठ को कमजोर और कमजोर को सत्ता के सहारे श्रेष्ठ बनाया जा रहा है। यही असंतुलन अंततः विनाश को जन्म देता है।

निष्कर्ष
पूरा विश्व आज स्वयं को सुपरपावर समझने की भूल कर रहा है। यही भूल सबसे बड़ा खतरा है।हमें शक्ति संपन्न नहीं, साधन संपन्न होना चाहिए।
शक्ति का प्रयोग रक्षा के लिए हो, प्रदर्शन के लिए नहीं।
यदि विकास का अर्थ केवल अधिक विनाशकारी हथियार बनाना है, तो ऐसा विकास सभ्यता नहीं, आत्महत्या है।
सभ्यता का भविष्य विज्ञान से नहीं, विवेक से सुरक्षित होगा।

डिस्क्लेमर:_“यह लेख लेखक के निजी विचारों और वैचारिक विश्लेषण पर आधारित है।”



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