कुरुक्षेत्र, विशेष डेस्क: 15/01/2026
महाभारत युद्ध के पश्चात जब पांडवों ने विजय प्राप्त की, तब धर्मराज युधिष्ठिर का मन अशांत था। वे रक्तपात और अपनों को खोने के शोक में डूबे थे। तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें एक ऐसे महापुरुष के पास ले गए, जो मृत्यु को अपनी मुट्ठी में थामे ‘शर-शय्या’ पर लेटे सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा कर रहे थे—वे थे भीष्म पितामह।
कृष्ण-भीष्म संवाद: भक्त और भगवान का मिलन
जब श्रीकृष्ण, पांडवों के साथ भीष्म के पास पहुँचे, तो एक अद्भुत दृश्य उपस्थित हुआ। बाणों की शय्या पर लेटे पितामह ने अपने आराध्य को देखते ही नेत्र सजल कर लिए। भीष्म ने कृष्ण से पूछा, “हे केशव! क्या यह सब छल आवश्यक था?” श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “पितामह! जब धर्म पर संकट आता है, तब मर्यादाओं से ऊपर उठकर धर्म की रक्षा करना ही परम सत्य होता है।” इस संवाद ने सिद्ध किया कि भीष्म का मौन और कृष्ण का चक्र, दोनों ही नियति के विधान थे।
विष्णु सहस्रनाम: मानवता को अंतिम उपहार
युधिष्ठिर ने जब भीष्म से पूछा कि संसार में सबसे श्रेष्ठ धर्म क्या है और किसका जाप करने से मुक्ति मिलती है, तब पितामह ने ‘विष्णु सहस्रनाम’ का उपदेश दिया। उन्होंने भगवान विष्णु के एक हजार नामों का उच्चारण किया, जिसे सुनकर स्वयं श्रीकृष्ण भावविभोर हो गए। भीष्म ने बताया कि विष्णु के इन नामों का स्मरण ही मनुष्य को भवसागर से पार उतारने वाला एकमात्र सुगम मार्ग है।
उत्तरायण और महाप्रयाण
ब्रह्मचर्य और योग के बल पर भीष्म ने 58 दिनों तक असहनीय पीड़ा को सहा। उन्होंने दक्षिणायन में शरीर त्यागना स्वीकार नहीं किया। जैसे ही मकर संक्रांति के दिन सूर्य ने उत्तर दिशा की ओर रुख किया, पितामह ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण कर प्राण त्याग दिए।
यह प्रसंग आज भी हमें सिखाता है कि जीवन में संघर्ष कितना भी कठिन क्यों न हो, यदि मन में ईश्वर के प्रति समर्पण और संकल्प की दृढ़ता हो, तो मृत्यु भी मंगलकारी उत्सव बन जाती है।


