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Tuesday, October 13, 2026

ज्योतिपति और ज्वाला सिंह: मीठी चुभन -भाग 1

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​दृश्य 1: जंतर-मंतर का खाली आसमान और बहरी दीवारें

न्यूज व्यंग्य लेखन- 12 अक्टूबर 2026

​स्थान: दिल्ली का जंतर-मंतर (दूर क्षितिज पर संसद भवन की धुंधली सी आकृतियां)

​(स्टेज पर एक तरफ ज्योतिपति हाथ में एक पुरानी डायरी लिए उदास खड़े हैं, और दूसरी तरफ ज्वाला सिंह हवा में हाथ लहराते हुए तंज कस रहे हैं। पृष्ठभूमि में एक तीखा लोक-संगीत बज रहा है।)

​ज्योतिपति: (आसमान की तरफ देखते हुए)

अरे ज्वाला भाई! ये सरकारें भी अजीब खेल खेलती हैं। अब लोग कह रहे हैं—जंतर-मंतर छोड़ो, बुराड़ी जाओ, सीबीडी ग्राउंड जाओ या रामलीला मैदान पहुंचो! कोई 12 किलोमीटर, कोई 20 तो कोई 21 किलोमीटर दूर धकेल रहा है हमें। पर कोई ये तो सोचे… जहां जनता है, वहीं तो जनतंत्र है! जहां मंत्र है, वहीं तो लोकतंत्र है!

​ज्वाला सिंह: (मूछों पर ताव देते हुए, ठहाका लगाकर)

अरे ज्योतिपति भाई, भूल गए क्या? नाम ही है ‘जंतर-मंतर’! ‘जन’ मतलब जनता, ‘तंत्र’ मतलब व्यवस्था, और ‘मंतर’ मतलब वो जादुई गूंज जो सीधे सिंहासन के कान के परदे फाड़ दे। अब जब जंतर ही छीन लोगे, तो मंत्र का असर कैसे होगा?

​ज्योतिपति: (गंभीर होकर)

वही तो! मंदिर के पास जाकर घंटी न बजाएं तो क्या भगवान बहरा हो जाता है क्या? जो भगवान पास की घंटी नहीं सुन सकता, वो दूर के पहाड़ों से क्या घंटा सुनेगा? वैसे ही, जहां सदन का मुख्य कार्यालय है, जहां देश की धड़कन धड़कती है, वहीं से तो आवाज़ तुरंत गूंजती है। अब हमें सत्ता से कोसों दूर धकेल दोगे, तो आवाज़ तो धीमी होगी ही… भाई, क्या सरकारें वाकई बहरी हो गई हैं?

​दृश्य 2: मक्खी, हथौड़ा और सुप्रीम कोर्ट का जाला

​ज्वाला सिंह: (व्यंग्य भरी हंसी के साथ)

अरे सरकार बहरी हो या न हो, लेकिन हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी जरूर गूंजी है। अदालत ने कहा—“मक्खियों को भगाने के लिए क्या हथौड़ा चलाओगे?”

​ज्योतिपति: (सिर खुजाते हुए)

  • हथौड़ा? अरे भई, सुप्रीम कोर्ट में तो बस ‘ऑर्डर-ऑर्डर’ वाला हथौड़ा ही बजता है। पर क्या अदालत इतनी कमज़ोर है कि मक्खी मारने के लिए हथौड़ा उठाएगी? अरे हुज़ूर, मक्खी भगाने के लिए हथौड़ा थोड़ी, एक अदद जाली चाहिए! जाली लगाओ, मक्खी उसमें खुद-ब-खुद फंस जाएगी। या फिर… एक काम करो, ज़रा सा गुड़ रख दो। मक्खी उस गुड़ में ऐसी गड़ेगी कि उसके पंख लिपट जाएंगे, हाथ मलेगी और सिर धुनती रह जाएगी—कहते हैं ना, लालच बुरी बला है!

​ज्वाला सिंह: (आंखें तरेरते हुए)

हाँ! लेकिन फिल्मों ने मक्खियों को कभी कमज़ोर नहीं समझा भाई! एक फिल्म में एक किरदार था… नाम था राहुल गुप्ता, और उसके भाई का नाम था ‘मक्खी’! अब मक्खी है, तब तक तो ठीक है, सीधी-साधी है।

​लेकिन… अगर यही मक्खी ‘मधुमक्खी’ बन गई, और उसके छत्ते पर किसी ने पत्थर मार दिया ना… तो सारा छत्ता भिनभिना उठेगा! फिर हथौड़ा तो दूर की बात, पानी में डूबकर भी कोई इनसे बच नहीं पाएगा! ये है वो मीठी चुभन, जो सत्ता के मीठे गुड़ से चिपककर भी डंक मारना जानती है।

​दृश्य 3: वह मयखाने का जाम और जंतर का पैगाम

​ज्योतिपति: (कविता के अंदाज़ में, थोड़ा संजीदा होकर)

मैंने भी कहीं पढ़ा था, एक शायर ने क्या खूब कहा था—

​“जन्नत में शराब पीने दे, या मीना में बैठकर… या कोई ऐसी जगह बता, जहाँ कोई जुदा न हो!”

​आज हालात ये हैं कि हर जगह से जनता को भगाया जा रहा है। पर सवाल ये है—क्या इस देश के नक्शे पर कोई ऐसी जगह बची है, जहाँ लोकतंत्र न हो? और अगर लोकतंत्र हर जगह है, तो फिर इस आवाज़ को शहर की सीमाओं के बाहर क्यों कैद किया जा रहा है?

​ज्वाला सिंह: (आगे बढ़कर, जनता की तरफ हाथ उठाकर जोश से)

बस! अब यही सवाल ज्योतिपति भाई, इस नई दास्तान की धुरी है। सत्ता चाहे हमें 20 किलोमीटर दूर धकेल दे, चाहे बुराड़ी के मैदान में छोड़ दे—ये मक्खी रूपी जनता जब मधुमक्खी बनकर भिनभिनाएगी ना, तो बड़े-बड़े महलों के शीशे चटक जाएंगे। यही है हमारी आज की ‘मीठी चुभन’!
​प्रकाश धीरे-धीरे कम होता है, पृष्ठभूमि में गूंजती हुई जन-आवाज़ के साथ पर्दा गिरता है।
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