तिरुपति, 27 दिसंबर 2025
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने आंध्र प्रदेश के तिरुपति में आयोजित भारतीय विज्ञान सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर विज्ञान और धर्म के बीच गहरा सामंजस्य पर जोर दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि दोनों का अंतिम लक्ष्य एक ही है- सत्य का ज्ञान प्राप्त करना। राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में चल रहे इस चार दिवसीय सम्मेलन (27 से 29 दिसंबर) में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू और केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत भी शामिल हुए।
डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में भारत के उज्ज्वल भविष्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देश केवल सुपर पावर नहीं, बल्कि विश्व गुरु बने। उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर में दर्शन कर धर्म और विज्ञान के समन्वय का प्रतीकात्मक संदेश दिया। सरसंघचालक ने जोर देकर कहा, “विज्ञान और धर्म के बीच कोई वास्तविक टकराव नहीं है। दोनों अलग-अलग रास्तों से एक ही सच्चाई की खोज करते हैं।”
उन्होंने धर्म की गलतफहमी दूर करते हुए स्पष्ट किया कि धर्म कोई संप्रदाय या अंधविश्वास नहीं, बल्कि ‘सृष्टि के कामकाज को नियंत्रित करने वाला विज्ञान’ है। “यह वह शाश्वत कानून है जिससे सृष्टि चलती है। चाहे कोई माने या न माने, कोई इससे बाहर नहीं रह सकता। धर्म में असंतुलन विनाश का कारण बनता है,” उन्होंने चेतावनी दी। डॉ. भागवत ने ऐतिहासिक रूप से विज्ञान द्वारा धर्म से दूरी बनाने की प्रवृत्ति को मौलिक भूल बताया। उनके अनुसार, विज्ञान और आध्यात्मिकता में कार्यप्रणाली भले अलग हो, लेकिन लक्ष्य समान है- सत्य का अनुभव।
सम्मेलन में वैज्ञानिकों, विद्वानों और नीति निर्माताओं ने भाग लिया। डॉ. भागवत का यह संदेश भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सम्मेलन के शेष सत्रों में विज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिकता पर गहन चर्चा होगी। यह आयोजन भारत को वैश्विक नेतृत्व प्रदान करने की दिशा में एक कदम है।


