अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल जांच की दिशा तय करेगा, बल्कि केंद्र–राज्य संबंधों और संवैधानिक मर्यादाओं के लिहाज से भी बेहद अहम माना जा रहा है।
नई दिल्ली_18/02/2026
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक अहम कदम उठाते हुए से मांग की है कि मामले की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच सुनिश्चित करने के लिए इसे (CBI) को सौंपा जाए। सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे में ने पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री पर जांच में बाधा डालने के गंभीर आरोप लगाए हैं।
संवैधानिक मशीनरी के क्षरण का आरोप
ईडी ने हलफनामे में दावा किया है कि राज्य में प्रभाव, सत्ता और सुरक्षा तंत्र का दुरुपयोग कर जांच को प्रभावित करने की कोशिश की गई। एजेंसी के अनुसार, हालात ऐसे हैं कि स्थानीय पुलिस पर भरोसा नहीं किया जा सकता, जिससे निष्पक्ष जांच पर सवाल खड़े होते हैं। ईडी ने यहां तक कहा कि राज्य में संवैधानिक मशीनरी का क्षरण हो चुका है।
डिजिटल साक्ष्यों से छेड़छाड़ का गंभीर दावा
ईडी का सबसे बड़ा और गंभीर आरोप डिजिटल साक्ष्यों से छेड़छाड़ को लेकर है। हलफनामे में कहा गया है कि:
IPAC कार्यालय में कंप्यूटर डेटा का बैकअप रोका गया,
CCTV स्टोरेज डिवाइस हटाए गए,
जांच शुरू होने से पहले डिजिटल रिकॉर्ड्स में छेड़छाड़ की गई।
एजेंसी का कहना है कि यह महज प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संगठित तरीके से साक्ष्य नष्ट करने का प्रयास है, जो कानून के तहत गंभीर आपराधिक कृत्य की श्रेणी में आता है।
Z प्लस सुरक्षा के दुरुपयोग का आरोप
ईडी ने यह भी आरोप लगाया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को मिली Z प्लस सुरक्षा का उपयोग जांच एजेंसियों और गवाहों पर दबाव बनाने के लिए किया गया। हलफनामे में सवाल उठाया गया है कि यदि किसी सुरक्षा व्यवस्था का इस्तेमाल जांच को प्रभावित करने, डराने या धमकाने के लिए किया जाता है, तो यह पद के दुरुपयोग, सार्वजनिक शक्ति के मनमाने प्रयोग और संवैधानिक नैतिकता के उल्लंघन का मामला बनता है।
CBI जांच की मांग
ईडी ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट रूप से कहा है कि मौजूदा हालात में राज्य पुलिस या स्थानीय प्रशासन के भरोसे जांच नहीं छोड़ी जा सकती। इसलिए, मामले की सच्चाई सामने लाने और कानून का राज कायम रखने के लिए CBI को जांच सौंपना जरूरी है।


