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Saturday, March 7, 2026

भारत बंद:_78 साल के भारत में क्या बदला,30 करोड़ मजदूरों का शोर या सिस्टम की खामोशी?

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नई दिल्ली(भारत बंद)_विशेष लेख_12/02/2026

(ज्वाला’ और ‘ज्योतिपति’ का वैचारिक महासंग्राम!)
कहो ज्योति पति आज फिर तुम गुमसुम खड़े हो तुम्हारे पास क्या मुद्दा है “”यह मुझे बताओ मेरे लिए सब कुछ सरल है?मै तो मजदूरों की आवाज उठाने जा रहा हूं ,नए श्रम कानून के विरोध में भारत बंद को समर्थन देने जा रहा हूं ।क्या किसान मजदूर नागरिक नहीं है ,उनको समान नागरिकता का अधिकार नहीं है क्या?देश उसे आज भी मजदूर मानता है।समाज का अभिन्न अंग कब बनेगा!जिस फैक्टरी में दिन रात मेहनत करता है पसीना बहाता है एक उन्नत फैक्ट्री बनाता है क्या फैक्ट्री मालिक उसे पहचानता है नहीं ??वहां भी बीच में ठेकेदार है ,मजदूर के।

हां,ज्वाला तुम सही कह रहे लेकिन कुछ बदलना अब हमारे बस की बात नहीं है देश का संचालन अब एक अलग ही सिस्टम कर रहा है और हम सिस्टम के पार्ट्स हैं पार्ट्स क्या कर सकता है ज्यादा कुछ करेगा ज्यादा चलेगा खराब हो जाएगा।

ज्वाला अपने तेवर में कहा मेहनत मुर्गे की, दावत फकीर की?
ज्वाला का तर्क है कि मजदूर पसीना बहाकर फैक्ट्री खड़ी करता है, पर मालिक उसे पहचानता तक नहीं। यहाँ सरकारी पक्ष बड़ा स्पष्ट रहता है:
हमने ‘ई-श्रम’ पोर्टल बनाया है, अब हर मजदूर का एक नंबर है।”
सच भी है, मालिक नाम से न सही, नंबर से तो पहचानेगा ही! ठेकेदारी प्रथा को ‘इज ऑफ डूइंग बिजनेस’ का नाम देकर सिस्टम ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि मजदूर सीधे मालिक से टकराकर अपनी भावनाएं खराब न करे, बीच में ठेकेदार का ‘फिल्टर’ लगा रहे।ज्वाला वहां से चला गया।

ज्योतिपति सोच रहा आरक्षण का पालना से लेकर धर्म विवाद ,शिक्षा में यूजीसी विवाद,सदन में बहस,,
क्या 78 साल का बुजुर्ग देश अब भी झुलाते रहेगा? 78 साल से आरक्षण के पालने में झूल रहे लोग कब खुद चलना सीखेंगे? वहीं प्रशासनिक गलियारों का मानना है कि यह पालना दरअसल एक ‘सोशल सेफ्टी नेट’ है। सरकार का तर्क है कि जब तक समाज की सीढ़ियां सबके लिए बराबर नहीं होतीं, तब तक कुछ लोगों को लिफ्ट (आरक्षण) देना मजबूरी है। हालांकि, ज्वाला जैसे युवाओं को लगता है कि लिफ्ट में भीड़ इतनी है कि सीढ़ियों से चढ़ने वाले थक कर बैठ गए हैं।

कल की बात देखो_
Sold Out’ का शोर और विदेशी कर्ज की लोरी
विपक्ष चिल्ला रहा है कि देश बिक रहा है, ‘Sold-Sold’ की गूंज है। ज्योतिपति इस मानसिक द्वंद्व में है कि क्या हम नए औपनिवेशिक दौर की तरफ बढ़ रहे हैं?
सरकारी स्टैंड:”यह कर्ज नहीं, ‘निवेश’ है। हम भविष्य की नींव रख रहे हैं।”
हकीकत:महंगाई सुरसा की तरह मुंह फाड़ रही है। आम आदमी समझ नहीं पा रहा कि वह ‘मच्छर’ बनकर इस सिस्टम की जाली से बाहर निकले या महंगाई ही उसे मच्छर बना मसल दे।

बड़ा सवाल: मंदिर-मस्जिद या शुद्ध देशप्रेम?
आज देश में मंदिर-मस्जिद की कोई कमी नहीं है, अगर कमी है तो उस ‘शुद्ध भारतीयता’ की जो जाति और धर्म से ऊपर उठकर सोचे। पढ़े-लिखे अफसर (IAS/IPS) भी क्या इस तंत्र में कुछ बदल पाएंगे? या फिर देश को अब एक ऐसे ‘सहारा देने वाले मजबूत कंधे’ की तलाश है जो बिना किसी भेदभाव के 140 करोड़ लोगों को साथ लेकर चले।क्योंकि आज तक कोई पार्टी शुद्ध भारतीयता के साथ नहीं चला है सबके अपने-अपने पार्टी एजेंडा है और वोट बैंक की चिंता।

डिस्क्लेमर:यह भारत बंद की घटना पर आधारित मात्र एक वैचारिक चिंतन लेख है कोई विवाद का विषय नहीं।


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