साधना जब अभिनय से मुक्त होती है,
तब ही आत्मसंवाद की शुरूआत होती है।
चिंतन लेख | जनचौपाल 36)
वह मौन था, लेकिन मौन नहीं था।
वह खोया था, पर खो नहीं गया था।
वह किसी से नहीं बोलता था — शायद इसलिए कि
वह खुद से बोलने लगा था।
🔹 वह कोई ऋषि नहीं था, न संत, न सन्यासी।
वह तो हमारे ही बीच का एक साधक था —
शब्दों की भीड़ से थक चुका,
धारणाओं के जाल से ऊब चुका,
कर्मकांडों की धूल से आँखें मसलता हुआ
अपने भीतर की ओर लौट चला था।
“लोगों ने बहुत कुछ कहा…
अब मैं खुद को सुनना चाहता हूँ”
उसने एक दिन धीमे से कहा था।
🔸 वह दीप-दृष्टा था —
जिसने बाहर की लौ से नहीं,
भीतर की अग्नि से देखना शुरू किया।
उसके सवाल तीखे नहीं थे,
लेकिन गहरे थे।
उसका मौन डरपोक नहीं था,
वह जिज्ञासा से भरा था।
वह पूछता नहीं था, टटोलता था।
वह कहता नहीं था, जीता था।
🔹 क्या पूछा उसने?
“जिसे मैं ‘मैं’ कहता हूँ,
क्या वह देह है या केवल विचार?”
“जो मृत्यु के बाद नहीं दिखता,
क्या वह जीवन में भी सच में था?”
“अगर मैं स्थायी नहीं हूँ,
तो इतना ‘अहम्’ क्यों है?”
इन प्रश्नों में वह इतना खो गया,
कि बाहर की दुनिया उसे खो बैठी।
लेकिन उसे मिला — खुद का स्पर्श।
🔸 उसका जीवन साधना था, प्रदर्शन नहीं।
वह किसी मंदिर का पुजारी नहीं था,
लेकिन हर सांस में प्रार्थना थी।
वह किसी धर्म का प्रचारक नहीं था,
लेकिन उसका मौन ही धर्म था।
लोग उसे सनकी समझते थे।
लेकिन वह एकांत में सबसे प्रखर था।
भीतर गूंजती थी आवाज़ —
“तू जो खोज रहा है, वह तू ही है…”
🔹 वह साधक था, इसलिए ‘दीप’ था।
क्योंकि उसने अंधकार को रोशनी में बदला नहीं,
बल्कि उसे समझा,
उससे डरा नहीं,
उसके साथ बैठा।
और तभी…
भीतर से एक लौ उठी, जिसने दृष्टा को जन्म दिया।
उस दिन उसने कहा:
“अब मैं ना साधक हूँ, ना पथिक।
अब मैं सिर्फ ‘प्रकाश’ हूँ।
बाकी सब बीत गया है…”
📜 निष्कर्ष
“दीप दृष्टा” कोई व्यक्ति नहीं है।
वह हम सब के भीतर का ही एक भूला हुआ कोना है —
जहाँ अब तक हमने झाँका नहीं।
जिस दिन हम वहाँ उतरते हैं,
हम भी वही हो जाते हैं।
डिस्क्लेमर:_यह लेख मात्र एक विचार है जो सर्वथा कल्पना में है।इसमें कोई सत्यता की पुष्टि नहीं है न कोई विवाद का विषय है।एक संक्षिप्त जानकारी है जो किसी की भावना आहत करने की कोशिश नहीं है। अध्यात्म बहुत व्यापक है,भूल पर क्षमा करेंगे।


