(कर्म की शक्ति पर एक आध्यात्मिक–दार्शनिक रचना)
“जहाँ प्रतिक्रिया थमती है, वहीं समझ जन्म लेती है”
“प्रतिक्रिया नहीं, समझ चुनिए—यही कर्म की परिपक्वता है”
जीवन में उलझना नहीं है तो सबसे पहले
प्रतिक्रिया बदलिए, परिणाम बदल जाएगा”
यदि मैं प्रतिक्रिया नहीं,समझ चुनूँ,तो सबसे पहले मेरा मन शांत होगा।फिर मेरी सेहत बचेगी।फिर वह नकारात्मक ऊर्जा मुझ पर हावी नहीं होगी।
“प्रतिक्रिया पर विजय ही आत्मिक शांति का मार्ग है”और संभव है—दूसरा भी बदल जाए।हम यह सोचते रहते हैं—“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?”पर सही प्रश्न यह है—
“मैं इसके साथ क्या कर रहा हूँ?”जो मैं सोचता हूँ—वह कर्म है।जो मैं बोलता हूँ—वह कर्म है।जो मैं करता हूँ—वह कर्म है।
“क्रिया नहीं, प्रतिक्रिया पर दृष्टि रखें”
थोड़े गहरे आध्यात्मिक भाव के साथ:
और जो मेरे साथ होता है—वह मेरे कर्मों की भाषा में लिखा हुआ मेरा भाग्य है।मैं कैसे बात करूँ—यह मेरा कर्म है।
मुझसे कैसे बात की जाए—यह मेरा भाग्य है।इन दोनों के बीच का सेतु एक ही नियम से बना है—जैसा कर्म, वैसा फल।
युग बदलने के लिए समय नहीं बदलना पड़ता,इंसान बदलना पड़ता है।और इंसान बदलने के लिए सबसे पहले यह स्वीकार करना पड़ता है—करना है… खुद को करना है।
हम अक्सर जीवन को ऊपर की ओर देख कर जीते हैं।
जो हुआ—भगवान ने किया।जो होगा—भगवान करेंगे।
और जो नहीं हो रहा—उसके लिए भी हम उन्हीं से शिकायत करते हैं।
हम रोज़ प्रार्थना में कहते हैं—“हे प्रभु, मेरी समस्या ठीक कर दो।”पर क्या समस्या का समाधान किया जा सकता है, या उसे किया जाना पड़ता है?
अगर मेरे सामने एक भारी मेज़ रखी हो और मुझे उसे उठाना हो,तो क्या प्रार्थना से वह अपने आप उठ जाएगी?नहीं।पर प्रार्थना मुझे वह शक्ति दे सकती है जिससे मैं मेज़ उठा सकूँ।यही वह सूक्ष्म अंतर है,जिसे समझ लेने से जीवन का पूरा दर्शन बदल जाता है।
परमात्मा हमारे कर्म नहीं करते।वे हमें कर्म करने की क्षमता देते हैं।वे हमारे हिस्से का श्रम नहीं उठाते,वे हमारे भीतर वह साहस जगाते हैं जिससे हम श्रम कर सकें।
जैसे माता–पिता बच्चे का होमवर्क नहीं करते,पर उसे सीखने की शक्ति देते हैं—वैसे ही ईश्वर हमारे जीवन का होमवर्क हमारे बदले नहीं करते।जब यह समझ नहीं होती,तो हम भटकते हैं।एक से मांगते हैं,न मिला तो दूसरे की ओर मुड़ जाते हैं।
विश्वास बदलते रहते हैं,पर दृष्टि नहीं बदलते।जीवन का सबसे कठोर और सबसे न्यायपूर्ण नियम है—जैसा कर्म, वैसा फल।
कर्म दिखाई नहीं देता,फल दिखाई देता है।इसी भ्रम में हम भाग्य को दोष देते हैं।मैंने कोई वस्तु फेंकी—वह लौटकर आई।
पर मुझे सिर्फ आती हुई वस्तु दिखी,फेंकना याद नहीं रहा।
“जब प्रतिक्रिया रुकी, तभी भीतर का युद्ध थमा”
किसी ने मुझे अपमानित किया—मुझे अपमान दिखा,अपनी भीतर की कठोरता नहीं दिखी।
कोई मुझे धोखा देता है—मुझे धोखा दिखता है,मेरी पूर्व चेतावनियाँ नहीं दिखतीं।
जब कोई अनचाही वस्तु मेरी ओर आती है,तो मेरे पास विकल्प होता है—
मैं भी वही चीज ही लौटाऊँ,या उसे यहीं थाम लूँ।
गाली के बदले गाली—यही कलियुग है।
गाली के बदले समझ—यहीं से सतयुग शुरू होता है।


