34.4 C
Raipur
Saturday, March 7, 2026

भाग 8 💐(संवेदनात्मक विस्तार): विदाई और वादा, फिर मिलेंगे💐 (चांदी की पहाड़ी)

Must read

गतांक 7 से आगे :_ प्रेम की वह रात्रि, जब दोनों आत्माएँ एक हो चुकी थीं — अब बीती रात की तरह पीछे छूटने को थी।
सुबह की किरणों के साथ विनीता की वापसी की तिथि भी जाग गई थी।
सारा जैसलमेर आज जैसे मौन हो गया था — हवाओं की गति धीमी थी, और सूर्य की रोशनी में भी एक उदासी घुली हुई थी।
रेलवे स्टेशन की ओर जाने से पहले, दोनों एक बार फिर गड़सीसर झील के किनारे खड़े हुए।
वह झील, जो उनकी प्रेम कथा की साक्षी बनी थी, आज बिलकुल शांत थी — मानो वो खुद इस बिछोह से दुखी हो।

विनीता ने धीमे स्वर में कहा —
“कभी कभी सोचती हूँ, जो पल हमेशा के लिए लगते हैं, वो इतने जल्द क्यों बीत जाते हैं?”
अनिमेष ने उसकी ओर देखा, और बिना कुछ कहे उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
“क्योंकि उन्हें हम जिया करते हैं, समय नहीं।” — उसने हल्के से उत्तर दिया।

वे दोनों स्टेशन पहुंचे। विनीता के पास ज़्यादा सामान नहीं था, लेकिन उसके दिल में हज़ारों यादें थीं — हर स्मृति में अनिमेष की मुस्कान, उसका हाथ थामना, उसकी बातें, उसकी चुप्पियाँ।
प्लेटफॉर्म पर हलचल थी, लेकिन उनके बीच सिर्फ शांति।
विनीता ट्रेन के पास खड़ी थी, आँखों में नमी और अधरों पर मजबूर हँसी।
“अनिमेष,” उसने कहा, “मुझे कमजोर मत समझना… लौटने वालों को कभी कमजोर नहीं समझा जाना चाहिए।
मैं वादा करती हूँ — तुम्हारा इंतज़ार करूंगी… और तब तक तुम्हारे लिए पत्र लिखती रहूँगी।
फिर जब पहाड़ों पर बर्फ गिरेगी… और तुम्हारा मन ठंडी हवा को छूने को तड़पेगा…
तुम आना — चाँदी की पहाड़ी पर… जहाँ मैं तुम्हें फिर से गले लगाऊँगी।”

अनिमेष ने उसका बैग थामा, फिर धीरे से उसकी उंगलियाँ अपनी उंगलियों से छूते हुए बोला —
“तुमने मुझे एक ऐसा हिस्सा दिया है जो अब मुझसे कभी अलग नहीं होगा।
और मैं वादा करता हूँ… जब बर्फ गिरेगी, मैं चल पड़ूँगा — अपने उस मौसम की ओर, जिसमें तुम सांस लेती हो।”

ट्रेन का हॉर्न गूंजा।
विनीता ने ट्रेन की सीढ़ियाँ चढ़ीं…
दोनों की आँखों में अब तक अनकहे शब्द थरथरा रहे थे — लेकिन उन आँखों में वादा था, प्रेम था… और एक लंबा इंतज़ार।
जैसे ही ट्रेन ने गति पकड़ी, विनीता ने खिड़की से झाँका।
अनिमेष उसी जगह खड़ा रहा — हाथ हिलाते हुए नहीं, बस देखते हुए… जैसे हर दृश्य को आँखों में क़ैद कर लेना चाहता हो।
और विनीता…
उसकी आँखों में आंसू नहीं थे — वहाँ एक विश्वास था —
अगर आत्मा के मिलन का रंग होता, तो वह रेत-सा होता – मिटने वाला नहीं, बस हर बार नया रूप लेने वाला।”
“ये विदाई नहीं… बस, अगली मुलाक़ात तक की दूरी है।”


(एकांकी या लघु कहानी )का यही अंतिम भाग है?धन्यवाद

- Advertisement -spot_img

More articles

- Advertisement -spot_img

Latest article