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Saturday, March 7, 2026

भाग 7: रंग, राग और रात्रि (वापसी अतीत की ओर)

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झील से लौटने के अगले दिन…
जैसलमेर की गलियों में आज एक उत्सव का सा माहौल था — कहीं लोकगीत गूंज रहे थे, तो कहीं कठपुतलियों के माध्यम से वीरगाथाएँ सुनाई जा रही थीं।
विनीता और अनिमेष भी आम लोगों के बीच जाकर बैठ गए — बिना किसी विशेषाधिकार के, सादे वस्त्रों में, जैसे इस मिट्टी का हिस्सा हों।
अनिमेष ने एक छोटे बाल कलाकार की ढोलक पर थाप लगाई, और विनीता ने पास बैठी महिलाओं के साथ पारंपरिक राजस्थानी गीत में सुर मिलाया।
उनकी हँसी, उनकी तालियों की गूंज, और एक-दूसरे को देखते हुए मुस्कुराना — यह सब जैसे साक्ष्य था कि अब वे केवल एक-दूसरे के प्रेम में नहीं, इस भूमि की आत्मा में भी मिल चुके हैं।
शाम ढलते-ढलते एक छोटी सी लोकनाट्य मंडली ने “ढोला-मारू” की कथा प्रस्तुत की।
विनीता, उस कथा में डूबी हुई बोली —
“क्या प्रेम सच में इतना ही सच्चा होता है, जब वो लोककथाओं का हिस्सा बन जाता है?”
अनिमेष ने उसकी ओर देखा और कहा —
“या शायद प्रेम इतना ही सच्चा होता है, जब वह लोककथा बन जाए बिना भी, पूरी हो जाए।”

रात्रि का तीसरा प्रहर…
आकाश चुप था, हवाएँ ठहर चुकी थीं, और रेगिस्तान अब नीरव था।
कहीं दूर एक प्रेम विरह गीत सुनाई दे रही थी
केसरिया बालम… पधारो म्हारे देस…”
और विनीता की आँखें नमी से भीग गईं। अनिमेष ने उसका हाथ पकड़ते हुए कहा,
“इन गीतों में सिर्फ विरह नहीं है, तुम्हारा आना भी है… और मेरा ठहर जाना भी।”

अनिमेष ने उसका हाथ थाम लिया।
दोनों के बीच कोई आवाज़ नहीं थी।
सिर्फ हृदय की धड़कनें थीं… और आत्मा की तरंगें।
कुछ देर बाद विनीता ने पूछा—
“तुम्हें मुझमें क्या सबसे अलग लगता है?”
अनिमेष ने उत्तर देने में समय लिया, फिर कहा—
“तुम्हारे भीतर एक हिमालय है — शांत, उज्ज्वल, लेकिन रहस्यपूर्ण।
और एक झरना भी, जो हर दर्द को बहा ले जाता है।”

विनीता चुप हो गई।
कुछ क्षणों के मौन के बाद वह बोली—
“और तुम्हारे भीतर एक जंगल है, जिसमें मैं खो जाना चाहती हूँ…
जहाँ शब्द पेड़ों पर उगते हैं, और हर पत्ती एक कविता है।”
विनीता ने अनिमेष का हाथ जोर से पकड़ा और खींच दिया दोनों वहीं रेत पर बैठ गए

अनिमेष की आँखों से एक चमक फूटी—वह जो केवल पहचाने जाने पर आती है।
“क्या तुम डरती नहीं?”
उसने पूछा।
“नहीं,” विनीता ने कहा।
“डर तो तब लगता है जब प्रेम अधूरा हो…
तुमसे तो लगता है मैं पूरी हो रही हूँ…”
🌌

दोनों ने एकांत स्थान की ओर रुख किया — एक पुराना हवेलीनुमा कक्ष, जहाँ टीलों की छाया थी और चाँदनी उनकी एकमात्र चादर।
विनीता के केश खुले थे, चेहरे पर चाँदनी का धुंधला प्रकाश था, और उसके नेत्रों में कोई प्रश्न नहीं — केवल विश्वास।
अनिमेष ने उसके माथे को चूमा — एक स्पर्श जो अनुमति नहीं, आत्मीयता माँगता था।
वह क्षण — कोई आवेग नहीं, कोई लज्जा नहीं — केवल दो आत्माओं की पूर्ण अभिव्यक्ति थी।
रात, प्रेम की भाषा में लिखी जा चुकी थी।
और सुबह…
धूप की पहली किरणों के साथ, दोनों के चेहरे पर एक शांति थी —
जैसे कुछ अधूरा अब पूर्ण हो चुका था।
जैसे किसी मंदिर की आरती हो चुकी हो, और अब घंटियों के बाद केवल संतोष बचा हो।

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