प्रभु ने जो जीवन हमें उपहार में दिया है, उसे दूसरों की भलाई और अच्छे कर्मों में लगाओ। निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही वह असली खजाना है जो तुम्हारे साथ जाएगा।
जीवन सोपान:16/02/2026
ज्योतिपति: ज्वाला, इधर आओ! तुम्हें आज एक बहुत ही गहरा किस्सा सुनाता हूँ। क्या तुमने कभी सोचा है कि ‘प्यास’ असल में है क्या चीज़? वैसे तो देखा जाए, तो हमारी पूरी ज़िंदगी ही एक प्यास है। हम प्यासे ही पैदा होते हैं और प्यासे ही मर जाते हैं।
ज्वाला: (हैरान होते हुए) प्यास? हाँ ज्योतिपति जी, मैंने ‘प्यासा’ फिल्म तो देखी है, पर सच कहूँ तो उसके पीछे की कहानी और वह गहरा दर्शन मुझे कभी समझ नहीं आया।
ज्योतिपति: (मुस्कुराते हुए) फिल्म की बात अलग है ज्वाला, पर हकीकत में पानी की प्यास और दौलत की प्यास में ज़मीन-आसमान का फर्क होता है। सुनो, एक राजा था… उसने अपनी पूरी प्रजा पर बहुत जुल्म ढाए, बड़ी क्रूरता से बेशुमार दौलत इकट्ठा की। उसने एक शाही खजाना बनाया और उसे शहर की आबादी से दूर एक सुनसान जंगल के तहखाने में छिपा दिया।
ज्वाला: जंगल के बीचों-बीच? पर उसका राज कैसे बना रहा?
ज्योतिपति: राज़ इसलिए बना रहा क्योंकि उस खजाने की सिर्फ दो चाबियाँ थीं। एक राजा के पास और दूसरी उसके सबसे खास मंत्री के पास। उन दोनों के अलावा परिंदा भी नहीं जानता था कि वहाँ क्या है। एक दिन, राजा का मन हुआ कि वह अकेले अपने खजाने को देख आए। वह किसी को बिना बताए वहाँ गया, तहखाना खोला और अंदर चला गया। उन चमकते हुए हीरों और सोने को देखकर उसे जो सुकून मिल रहा था, वह उसके अहंकार को और बढ़ा रहा था।
ज्वाला: फिर क्या हुआ? क्या किसी ने उसे देख लिया?
ज्योतिपति: इत्तेफाक देखो! उसी वक्त वह मंत्री भी वहां से गुजर रहा था। उसने देखा कि तहखाने का दरवाजा खुला है। वह घबरा गया, उसे लगा कि शायद कल रात जब वह खुद आया था, तो गलती से दरवाजा खुला छोड़ गया होगा। उसने आनन-फानन में बिना अंदर देखे बाहर से कुंडी लगाई और ताला जड़कर वहाँ से चलता बना।
ज्वाला: (आश्चर्य से आंखें फैलाते हुए) अरे! पर राजा तो अंदर ही था?
ज्योतिपति: बिल्कुल! राजा जब अपना खजाना देखकर संतुष्ट हुआ और बाहर निकलने के लिए दरवाजे पर आया, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। दरवाजा बाहर से बंद था! उसने पत्थर से दरवाजा पीटा, पूरी ताकत से चिल्लाया, पर उस वीरान जंगल में उसकी आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं था। राजा थककर ढेर हो गया। अब न वहाँ हवा थी, न पानी। प्यास और भूख ने उसे पागलों जैसा बना दिया।
ज्वाला: वह तो खजाने के बीच में था, क्या वह कुछ नहीं कर पाया?
ज्योतिपति: वही तो विडंबना है ज्वाला! वह रेंगता हुआ हीरों के संदूक के पास गया और गिड़गिड़ाने लगा— ‘ऐ दुनिया के अनमोल हीरों, मुझे बस एक गिलास पानी दे दो।’ फिर वह मोती और सोने की ईंटों के पास गया— ‘ऐ दौलत के देवता, मुझे बस एक वक्त का खाना दे दो।’ उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वे बेजान हीरे उसे चिढ़ा रहे हों, कह रहे हों कि तेरी पूरी ज़िंदगी की कमाई तुझे एक घूंट पानी भी नहीं दिला सकती।
ज्वाला: (दुखी होकर) यह तो बहुत ही भयानक अंत है।
ज्योतिपति: अंत अभी बाकी है। भूख और प्यास से तड़पकर वह बेहोश हो गया। जब उसे आखिरी बार होश आया, तो उसने अपनी आँखों के सामने बिखरे उन बेशकीमती हीरों का एक बिस्तर बनाया और उस पर लेट गया। वह दुनिया को एक पैगाम देना चाहता था, पर उसके पास न कागज था, न कलम। उसने एक पत्थर से अपनी ही उंगली फोड़ी और बहते हुए खून से दीवार पर कुछ शब्द लिखे…
ज्वाला: क्या लिखा उसने?
ज्योतिपति: कई दिनों बाद जब मंत्री खजाना देखने आया, तो उसने देखा कि राजा की लाश हीरों के बिस्तर पर पड़ी है और उसे कीड़े-मकोड़े खा रहे हैं। दीवार पर खून से लिखा था— “यह सारी दौलत एक घूंट पानी और एक निवाला नहीं दे सकी।”
ज्वाला: (गहरी सोच में) यानी अंत में वह सब मिट्टी हो गया?
ज्योतिपति: यही अंतिम सच है, ज्वाला। जब हम इस दुनिया से जाते हैं, तो हमारे साथ सोना-चांदी नहीं, बल्कि हमारे ‘कर्मों की दौलत’ जाती है। चाहे हम कितना भी इकट्ठा कर लें, सब यहीं धरा रह जाएगा। इसलिए प्रभु ने जो जीवन हमें उपहार में दिया है, उसे दूसरों की भलाई और अच्छे कर्मों में लगाओ। निस्वार्थ भाव से की गई सेवा ही वह असली खजाना है जो तुम्हारे साथ जाएगा।


