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Saturday, March 7, 2026

3_भाग/ सोनार किले की प्रतीक्षा और वह अनायास मुलाकात(वापसी अतीत की ओर)

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🟣 परिचय
इतिहास और वर्तमान के मिलन की यह कहानी अब एक ऐसे मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ दो आत्माएँ — अनिमेष और विनीता — पहली बार एक-दूसरे को वास्तव में पढ़ना शुरू करती हैं। सोनार किले की वह मुलाक़ात, मरुस्थल की हवाओं में एक नई कहानी लिखने को तत्पर है।

✍️गतांक से आगे…
👉आज रात अनिमेष जल्दी खाना खा कर सो गया, क्योंकि कल उसे विनीता से मिलना था। सुबह उठते ही उसने खुद को आईने में देखा और सोचा — “कुछ बदलाव ज़रूरी हैं।”
उसने पुराने संदूक से अपनी मनपसंद शर्ट निकाली — वही शर्ट जिसे पहनकर लोग अक्सर कहते थे “तू तो हीरो लगता है इसमें।”
वह पहली बार अपने गेटअप को लेकर सजग हुआ, और मन में पहली बार यह भाव आया — “शायद मैं भी किसी के काबिल हूँ।”
जल्दी तैयार होकर वह सुनार किले पहुँच गया। लेकिन विनीता वहाँ नहीं दिखी। वह द्वार के पास खड़ा रहा, आँखें चारों ओर उसे खोजती रहीं।
अनिमेष… गाइड तो था ही, लेकिन उससे कहीं अधिक एक संवेदनशील कथावाचक था।
उसकी शैली, उसकी कहानियाँ पर्यटकों को इतिहास से जोड़ देती थीं। आज भी वह नए सैलानियों के साथ जैसेलमेर की गलियों में घूम रहा था, लेकिन मन पिछली शाम की उस मुलाकात में ही खोया था।
“यहीं से आरंभ हुआ था वह अध्याय, जहाँ इतिहास और वर्तमान की दहलीज़ पर दो आत्माएँ एक-दूसरे को पढ़ने लगी थीं…”
संध्या की सुनहरी किरणें मरुस्थल की रेत पर बिखर रही थीं। अनिमेष, अपनी परिचित मुस्कान के साथ
जैसलमेर के प्रसिद्ध शिव मंदिरों में रत्नेश्वर महादेव मंदिर, जो सोनार दुर्ग में स्थित है, और लौद्रवा का शिव मंदिर शामिल हैं। रत्नेश्वर महादेव मंदिर अपनी बारीक नक्काशी और पीले पत्थरों से बने होने के लिए जाना जाता है. लौद्रवा का शिव मंदिर, जो कभी प्राचीन रियासत थी, काफी प्रसिद्ध है, अनिमेष उन्हीं मंदिर की ओर पर्यटकों को ले जा रहा था — लेकिन उसकी दृष्टि आज किसी और को खोज रही थी।

और फिर… विनीता!
वह सामने खड़ी थी — पारंपरिक वेशभूषा में, सरल, सजीव, और किसी गहरी कहानी की तरह शांत।
विनीता ने मुस्कराते हुए कहा,
“माफ करना अनिमेष, मैं यहाँ की पारंपरिक पोशाक खरीदने चली गई थी… और मुझे यहाँ आकर कुछ करना भी तो है।
“चलो मैं भी शिव मंदिर के दर्शन को चलती हूं””
कुछ दूर चलने के साथ थोड़ी देर रुककर बोली —
“दरअसल, मैं रेगिस्तान के इतिहास पर रिसर्च कर रही हूँ।”

अनिमेष ने मुस्कराकर पूछा —
इतिहास में इतनी रुचि?”
विनीता ने उसकी ओर देख कर कहा —
इतिहास…? हाँ, लेकिन उससे भी ज़्यादा उसमें छिपी अधूरी कहानियों में। जैसे इस रेत में कोई सच्चाई दफ़्न हो, जो कभी पूरी कहानी नहीं बन सकी।”

उस एक उत्तर ने अनिमेष के भीतर कुछ खोल दिया। उसने पहली बार किसी सैलानी में अपने भीतर की आवाज़ सुनी।
रेत की उन लहरों के बीच,
दो आत्माएँ — एक ही अधूरी कहानी के दो पन्नों की तरह —
एक-दूसरे की ओर बढ़ चली थीं।
इतिहास ने वर्तमान से हाथ मिलाया था।
और समय ने इस मिलन को नाम दिया —
“एक ऐतिहासिक प्रेम कथा की शुरुआत।”
सभी सैलानी थक चुके थे, उन्होंने विदा ली।
चलते चलते अनिमेष ने धीरे से पूछा —
“क्या तुम कल मिलोगी?”
विनीता ने मुस्कराकर उत्तर दिया —
“हाँ, क्यों नहीं…”
और दोनों अपने-अपने रास्ते पर बढ़ चले।,(क्रमशः _3)





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