हक’ – तलाक से आगे बढ़कर औरत के आत्मसम्मान की कहानी
न्यूज आर्टिकल/फिल्म हक _09/11/2025
अक्सर कहा जाता है कि सिनेमा समाज का आईना होता है, लेकिन बीते कुछ समय से यह आईना मनोरंजन और हिंसा की परिधि में सीमित होता जा रहा था। इसी बीच रिलीज हुई फिल्म ‘हक’ दर्शकों को एक बार फिर सोचने पर मजबूर करती है कि फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, समाज की सच्चाइयों का प्रतिबिंब भी हो सकती हैं। सुपर्ण एस वर्मा के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक पत्नी की कानूनी और भावनात्मक यात्रा को दिखाती है, जो तीन तलाक के बाद भी अपने सम्मान को पुनः पाने की लड़ाई लड़ती है।
कहानी का गहराई से जुड़ाव शाह बानो प्रकरण से है, जहाँ न्यायालय का निर्णय समाज में महिला अधिकारों की दिशा तय करने वाला साबित हुआ था। ‘हक’ में भी यही संवेदना एक आधुनिक संदर्भ में उभरती है। फिल्म यह संदेश देती है कि जब रिश्ते टूटते हैं, तो असल परीक्षा आत्मसम्मान और समानता की होती है। इमरान हाशमी और यामी गौतम का अभिनय इन संवेदनाओं को सजीव बना देता है, जिससे दर्शक कहानी के हर पल से खुद को जुड़ा महसूस करते हैं।
प्रमोशन के दौरान अभिनेत्री यामी गौतम ने कहा कि जीवन केवल सांस लेने का नाम नहीं, बल्कि अपने भीतर की कला और उद्देश्य को पहचानने का अवसर है। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति ईश्वर की विशेष रचना है और उसकी क्षमता समाज को दिशा देने का सामर्थ्य रखती है। यामी का यह दृष्टिकोण फिल्म के संदेश से मेल खाता है — कि सच्ची कला वही है जो समाज में सोच की नई लहर पैदा करे।
‘हक’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है जो यह दिखाता है कि कानून, धर्म और पारिवारिक मूल्यों के बीच भी संवेदना और सम्मान के लिए जगह बन सकती है। यह फिल्म आज के दौर में भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा देती है — जहां पर्दे की कहानी केवल मनोरंजन तक नहीं, बल्कि सामाजिक आत्ममंथन तक पहुंचती है। ‘हक’ यह याद दिलाती है कि सिनेमा का असली हक तभी पूरा होता है, जब वह विचार और बदलाव दोनों को जन्म दे।


