भाग 5 से आगे:_सूर्यास्त की अंतिम किरणें आकाश से विदा ले चुकी थीं और रात्रि की नीरवता धीरे-धीरे हर ओर अपना साम्राज्य फैला रही थी।
झील की ओर जब विनीता की दृष्टि पड़ी, उसकी आँखों में बाल सुलभ आनंद झलक उठा।
उसने मुस्कराकर अनिमेष की ओर देखा और कहा —
“क्या तुम्हें नौका चलानी आती है? यह देखो, पतवार भी है… चलो, झील की सैर करते हैं।”
अनिमेष ने बिना कुछ कहे बस उसकी ओर देखकर सिर हिलाया।
पतवार को हाथ में थामा और विनीता को सहारा देकर नौका में बैठाया।
झील की लहरों पर धीरे-धीरे नौका आगे बढ़ने लगी — जैसे किसी स्वप्न का अवतरित हो जाना।
रात्रि की गहराइयाँ चारों ओर फैल चुकी थीं, पर उस नीरवता में भी कुछ संगीत छिपा था।
आकाश में चाँद अपने पूर्ण सौंदर्य के साथ प्रकाशित था — उसकी चाँदनी झील की सतह पर ऐसी बिखर रही थी, जैसे किसी ने रजतधारा बुन दी हो।
उस चाँदनी में झील की लहरें थिरकती प्रतीत हो रही थीं — मानो जल स्वयं कोई पुरानी रागिनी गा रहा हो।
अनिमेष और विनीता अब नाव में बिल्कुल पास बैठे थे।
कोई शब्द नहीं, केवल मौन, जो शब्दों से कहीं अधिक कह रहा था।
उस मौन में केवल एक ध्वनि गूंज रही थी — पतवार की छप-छप, जो झील के हृदय को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी।
झील के एक कोने में एक हंस का जोड़ा जल में कल्लोल कर रहा था — वह दृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो स्वर्ग के किसी कोमल स्वप्न में देवदूत अपनी प्रेयसी से प्रेमालाप कर रहे हों।
विनीता अब अनिमेष की ओर स्थिर दृष्टि से देख रही थी। उसकी आँखों में एक सम्मोहक नमी थी — वह नमी प्रेम की थी, संपूर्ण आत्म समर्पण की।
वह उसके इतने समीप थी, जैसे चाँदनी झील की लहरों के साथ घुलकर स्वयं पानी हो गई हो।
अनिमेष ने एक हाथ से पतवार थामी रखी थी, और दूसरा विनीता के हाथ पर अनायास ही ठहर गया।
वह कांपी नहीं, न ही पीछे हटी — वह उस स्पर्श में विश्वास, नजदीकी और सुरक्षा महसूस कर रही थी।
झील के मध्य में पहुँचकर अनिमेष ने पतवार थामना रोक दिया।
नौका अब लहरों के सहारे हौले-हौले बह रही थी —
जैसे समय, दिशा और उद्देश्य सब कहीं रुक गए हों…
केवल एक बात चल रही थी — प्रेम।
उस रात, झील की छाती पर दो आत्माएँ चाँदनी की चादर में लिपटी थीं — मौन, निशब्द… पर पूर्ण।
झील के मध्य…
नौका अब स्थिर थी। लहरों की हौली थपकियों में, दो आत्माएँ एक चुप्पी में बंध चुकी थीं।
चाँदनी जैसे उन पर बिछी हुई कोई पुरानी कविता हो — जिसकी हर पंक्ति अनकही, लेकिन महसूस की जा सकती थी।
विनीता का सिर धीरे से अनिमेष के कंधे पर टिका।
कुछ क्षणों बाद उसने बहुत धीमे स्वर में कहा —
“अनिमेष… क्या हर प्रेम को शब्दों की ज़रूरत होती है?”
अनिमेष ने मुस्कराकर उसकी ओर देखा और बोला
“नहीं…
कभी-कभी मौन ही वह सब कह देता है, जो शब्द नहीं कह पाते।”
विनीता ने फिर पूछा —
“तो आज की रात… क्या हमने कुछ कहा?”
अनिमेष ने उसकी हथेली अपने हाथ में लेकर उसे हल्के से दबाया और कहा —
“नहीं… हमने आज कुछ नहीं कहा। हमने आज… सब कुछ कह दिया।”
नाव अब धीरे-धीरे वापस किनारे की ओर बढ़ने लगी थी — पतवार फिर से पानी को चीरने लगी।
चाँद पीछे की ओर खिसक रहा था… और एक नया मौन फिर उतर आया था — लेकिन अब वह मौन बोझ नहीं, समझ का, विश्वास का और निकटता का मौन था।
किनारे के निकट पहुँचते हुए, विनीता ने फिर एक बार झील की ओर देखा, जैसे किसी स्वप्न को आंखों में संजो लेना चाहती हो।
वह बोली —
“अनिमेष… ये रात हमेशा मेरे भीतर बसी रहेगी। जब-जब मैं थक जाऊँगी, इस झील की चाँदनी में लौट आऊँगी… ठीक वैसे ही जैसे आज लौटी हूँ — खुद के भीतर।”
अनिमेष ने धीरे से कहा —
“और मैं हमेशा इस पतवार की तरह रहूँगा — तुम्हारी वापसी की दिशा थामे हुए।”
नाव अब किनारे से टकराने ही वाली थी।
धरती फिर से पाँवों के नीचे थी… लेकिन कुछ था जो अब बदल चुका था।



