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Saturday, March 7, 2026

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने UP सरकार को नोटिस भेजा यूपी गोरखपुर नेत्र शिविर हादसा

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गंभीर स्वास्थ्य लापरवाही ।मोतियाबिंद ऑपरेशन से 9 मरीजों की आंख निकली, 9 की रोशनी गई।यह घटना केवल “एक हादसा” नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में गहरी लापरवाही, नियमों की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाने और जवाबदेही की कमी का जीवित प्रमाण है।(फोटो सांकेतिक है)

नई दिल्ली,4 मार्च 2026:

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के एक निजी अस्पताल में मोतियाबिंद सर्जरी की लापरवाही का स्वतः संज्ञान लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर आयोग ने इसे मानवाधिकार उल्लंघन का गंभीर मामला माना है।

क्या हुआ नेत्र शिविर में?
1 फरवरी 2026 को आयोजित शिविर में 30 मरीजों की मोतियाबिंद सर्जरी की गई।निजी अस्पताल और यहाँ तक कि कुछ सरकारी नेत्र शिविर भी टार्गेट‑आधारित सोच पर चलते हैं: ज्यादा मरीज, ज्यादा मुनाफा या ज्यादा “प्रदर्शन का आंकड़ा”।

सर्जरी के बाद
सर्जरी के 24 घंटे बाद मरीजों को आंखों में तेज दर्द और स्राव की शिकायत हुई।इसी दौड़ में इंफेक्शन कंट्रोल प्रोटोकॉल, यंत्रों की ठीक से स्टरीलाइजेशन, दवाओं की एक्सपायरी जांच जैसी बुनियादी बातें नजरअंदाज हो जाती हैं। कुल 18 मरीज संक्रमित हो गए 9 की संक्रमित आंख निकालनी पड़ी, जबकि 9 अन्य की एक आंख की रोशनी हमेशा के लिए चली गई।

गंभीर हालत में मरीजों को दिल्ली, लखनऊ और वाराणसी के अस्पतालों में भेजा गया।रेगुलेशन की कम सुरक्षा बेल्ट निजी अस्पतालों पर नियमित और कड़ी निगरानी नहीं होती; जब तक ऐसी ट्रेजडी नहीं होती, तब तक शिकायतें या छोटी‑मोटी गड़बड़ियाँ अक्सर दबा दी जाती हैं।

NHRC का सख्त कदम
20 फरवरी 2026 को प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट पर NHRC ने तत्काल कार्रवाई की। आयोग ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और गोरखपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SP) को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। PIB दिल्ली द्वारा 3 मार्च 2026 को जारी प्रेस नोट में यह जानकारी दी गई।

गरीबी लाचारी का फायदा उठाते निजी अस्पताल
यह घटना स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही और निजी अस्पतालों की जवाबदेही पर सवाल खड़े करती है। आयोग ने पीड़ितों के स्वास्थ्य और सम्मान के अधिकारों का हवाला दिया है।ज्यादातर शिविर में लाभार्थी गरीब, ग्रामीण या शहरी निर्धन लोग होते हैं, जो डॉक्टरों से सवाल करने या फॉलो‑अप के लिए समय/पैसा नहीं रखते।ऐसे माहौल में लापरवाही जारी रहती है, क्योंकि “जिम्मेदारी का दबाव” कम लगता है।

36 गढ़ में भी निजी अस्पतालों के नियम पर ध्यान नहीं?
यह मामला सिर्फ एक निजी अस्पताल की गलती नहीं, बल्कि एक संस्थागत लापरवाही की चेतावनी है, जहाँ नियम हैं, रिपोर्ट हैं, कमेटियाँ हैं, लेकिन जमीन पर इंसानी जान और ज़िंदगी से जुड़ी जवाबदेही अभी भी ढीली है।


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