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Wednesday, March 11, 2026

धान का दाना-दाना हिसाब मांगे जनता — विधानसभा में हंगामे से नहीं, जवाबदेही से होगा समाधान

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छत्तीसगढ़ समाचार (संपादकीय)11. 3.2026

छत्तीसगढ़ विधानसभा के बजट सत्र में मंगलवार को जो दृश्य देखने को मिला, वह लोकतंत्र के लिए न तो नया है और न ही उत्साहजनक। विपक्ष का गर्भगृह में जाना, नारेबाजी करना फिर 30 विधायकों का निलंबन होकर बहाल होना — यह सब एक ऐसे ज्वलंत मुद्दे की आड़ में हुआ, जो वास्तव में गंभीर जांच और ठोस जवाब का हकदार था।

मुद्दा गंभीर है, हंगामा नहीं
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि “चूहों ने धान खाया या नहीं।” असली सवाल यह है कि 149.25 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद के बाद उसके भंडारण की जिम्मेदारी किसकी थी? नेता प्रतिपक्ष डॉ. चरण दास महंत के अनुसार, मार्कफेड के भंडारण केंद्रों से 16.03 लाख क्विंटल और खरीदी केंद्रों से 6.67 लाख क्विंटल धान गायब है। यह कोई छोटी संख्या नहीं है — यह लाखों किसानों की मेहनत और करदाताओं के हजारों करोड़ रुपए से जुड़ा मामला है।

सरकार के जवाब में कितनी पारदर्शिता?
खाद्य मंत्री दयालदास बघेल ने सदन में जो रिपोर्ट पेश की, उसमें कुछ सकारात्मक तथ्य भी थे। उन्होंने बताया कि 2739 में से 2728 खरीदी केंद्रों पर स्टॉक सत्यापन पूरा हो चुका है, दो भंडारण प्रभारियों पर एफआईआर दर्ज हुई है और दो अन्य निलंबित किए गए हैं। लेकिन 78 अधिकारियों को बस नोटिस भेज देना और बाकी 11 केंद्रों पर सत्यापन अधूरा रहना — ये बातें जनता के मन में संदेह पैदा करती हैं।

यदि नुकसान “कुल खरीद का तीन प्रतिशत से भी कम” है, जैसा सरकार कह रही है, तो भी 149 लाख टन का तीन प्रतिशत लगभग 4.5 लाख टन होता है — यह कोई मामूली आंकड़ा नहीं है।

विपक्ष का दायित्व भी है
विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना है, लेकिन गर्भगृह में जाकर नारेबाजी करना न तो किसान का भला करता है और न ही सदन की गरिमा बढ़ाता है। स्थगन प्रस्ताव के जरिए उठाया गया मुद्दा सही था, लेकिन उसे तर्क और तथ्यों के बल पर लड़ा जाना चाहिए था। सदन में जितना समय हंगामे में बर्बाद हुआ, उतने समय में शायद किसानों की असली समस्याओं पर कोई ठोस चर्चा हो सकती थी।

आदिवासी किसानों का क्या?
कांग्रेस विधायक कवासी लखमा का यह आरोप कि 32 हजार से अधिक आदिवासी किसानों से धान नहीं खरीदा गया — यह सबसे चिंताजनक पहलू है। यदि यह सच है, तो यह न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति की सबसे बड़ी विफलता है। सरकार को इस पर बिंदुवार और पारदर्शी स्पष्टीकरण देना चाहिए।

खबर का निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ की जनता चाहती है कि उसके धान का एक-एक दाना सुरक्षित रहे, किसानों को उनका उचित मूल्य मिले और दोषियों को सजा हो। इसके लिए सदन में सार्थक बहस, स्वतंत्र जांच और पारदर्शी रिपोर्टिंग जरूरी है — हंगामा नहीं।
लोकतंत्र में विरोध की आवाज बुलंद होनी चाहिए, लेकिन वह आवाज प्रश्न और तर्क की भाषा में होनी चाहिए, शोर की नहीं क्योंकि बाहर तो शोर ही शोर है।

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