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Saturday, March 7, 2026

किसानों की आय बढ़ाने सरकार की डिजिटल पहल: छत्तीसगढ़ से लेकर देशभर में बदलाव की बयार

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अब किसान सीधे खरीदारों से जुड़कर पा रहे अपनी उपज का बेहतर मूल्य

Janchoupal 36 | 23 जुलाई 2025(PIB)
भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां 65 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती-किसानी से जुड़ी हुई है। खासकर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहां आज भी गांवों की अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित है, वहां यह सवाल हमेशा खड़ा रहा है — क्या किसान को उसकी फसल का सही दाम मिलता है?
सरकार की कोशिश है कि किसान केवल उत्पादन तक सीमित न रहें, बल्कि उनकी फसल की बिक्री, भंडारण और मूल्य-निर्धारण में भी उनकी भूमिका और फायदा बढ़े।
ई-नाम, ओएनडीसी जैसे प्लेटफॉर्म से किसानों को सीधा डिजिटल बाजार
2016 में शुरू हुई ई-नाम (राष्ट्रीय कृषि बाजार) योजना का उद्देश्य था कि किसान बिचौलियों के झंझट से बाहर निकलकर सीधे देशभर के खरीदारों से जुड़ सकें। इसके साथ अब ओएनडीसी (ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स) और जीईएम (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) जैसे डिजिटल माध्यमों से किसानों, खासकर किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को जोड़ा जा रहा है।
छत्तीसगढ़ में डिजिटल मंडियों का असर
सूत्र बताते हैं धमतरी, कुरूद, राजनांदगांव, कवर्धा एवं मुंगेली में आदर्श मंडी की स्थापना की गई है।
जानकारी अनुसार राज्य के छत्तीसगढ़ सरकार के डिजिटल पोर्टल ई-नाम से राज्य के 27 में से 11 जिलों के किसान जुड़े हुए हैं। ये जिले हैं: रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, राजनांदगांव, जांजगीर-चांपा, रायगढ़, महासमुंद, धमतरी, कबीरधाम, बालोद और बेमेतरा। इससे धान, सब्जी और फल के उत्पादक किसानों को बाजार भाव की सही जानकारी मिल रही है और उनकी उपज की बिक्री अब सीधे खरीदारों को हो रही है।
RBI रिपोर्ट: किसान को सिर्फ 30–40% हिस्सा ही मिलता है
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के एक अध्ययन में बताया गया है कि
टमाटर, प्याज, आलू जैसी सब्जियों में किसान को उपभोक्ता से मिले पैसे का सिर्फ 33% से 37% हिस्सा ही मिलता है।
केला, अंगूर और आम जैसे फलों में यह हिस्सा 31% से 43% के बीच है।
बाकी हिस्सा ट्रांसपोर्ट, बिचौलियों, स्टोरेज और खराबी में चला जाता है। यही कारण है कि कृषि मार्केटिंग सुधार और इंफ्रास्ट्रक्चर पर जोर दिया जा रहा है।
कोल्ड स्टोरेज और पैकेजिंग से घटेगा नुकसान, बढ़ेगा फायदा
सरकार ने एग्रीकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (AIF) के तहत
किसानों, एफपीओ और मंडियों को कोल्ड स्टोरेज, छंटाई-पैकिंग इकाइयों के लिए सहायता देना शुरू किया है।
अब तक ₹8258 करोड़ की लागत से 2454 कोल्ड स्टोरेज प्रोजेक्ट्स को मंजूरी मिल चुकी है।
छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव और दुर्ग जिलों में शीतगृह और पैक हाउस निर्माण के कुछ सफल उदाहरण सामने आए हैं, जिससे किसानों का भंडारण खर्च घटा और उपज बर्बाद नहीं हुई।
बागवानी किसानों को विशेष मदद – MIDH योजना के तहत
बागवानी जैसे केला, आम, अमरूद, कटहल, मिर्च, फूल आदि की खेती करने वाले किसानों को MIDH (Mission for Integrated Development of Horticulture) के तहत
कोल्ड स्टोरेज, रीफर ट्रांसपोर्ट, राइपनिंग चैंबर जैसी सुविधाओं के लिए
सामान्य क्षेत्रों में 35%, और पहाड़ी/जनजातीय क्षेत्रों में 50% तक की सब्सिडी मिल रही है।
Janchoupal 36 की राय
छत्तीसगढ़ जैसे राज्य, जहां छोटे किसान, सीमांत और आदिवासी कृषक बड़ी संख्या में हैं — उनके लिए ये योजनाएं सिर्फ कागज़ी न रह जाएं, इसके लिए जागरूकता और क्रियान्वयन की पारदर्शिता ज़रूरी है।
यदि डिजिटल मंडियां, भंडारण सुविधा और मूल्य-निर्धारण की प्रक्रिया किसानों तक सीधे पहुँचे — तो भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव संभव है।
क्या आपके गाँव या जिले में कोई ऐसा किसान संगठन है जिसने डिजिटल मंडी से जुड़कर बदलाव लाया हो? अपनी कहानी हमें भेजें – हम उसे जनचौपाल 36 पर जगह देंगे।

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