खासमखास, खल्लास और ‘नेता’ साहब है या बॉस – हेल मोगैंबो।
20। सितंबर 2026
‘चौपाल की चुटकी’ (एक व्यंग्य)
चुनाव के मौसम में जो नेताजी आपके घर के दरवाजे पर बिन बुलाए दौड़ लगाने पहुँच जाते हैं, हाथ जोड़ते-जोड़ते पाँव में ही साष्टांग दंडवत हो जाते हैं और बिन माँगी चाय-पानी और जेब में दो-चार कड़क नोट भी थमा जाते हैं—वही नेताजी चुनाव खत्म होते ही ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग!
नेता बनने की होड़…और कुर्सी दौड़
आजकल देश में एक नया फ़ैशन ट्रेंड चल रहा है। सफ़ेद चमचमाता कुर्ता-पायजामा पहनिए, ऊपर से एक महंगी मोदी-जैकेट या नेहरू-जैकेट चिपकाइए और शीशे के सामने खड़े होकर बोलिए—“मित्रों, मैं नेता बन गया हूँ!”
आखिर इस ‘नेतागीरी’ में ऐसा कौन सा अमृत घुला है कि हर दूसरा बंदा जनता की सेवा करने के लिए बेचैन हुआ जा रहा है? आम आदमी बेचारा सुबह से शाम तक राशन, बिजली के बिल और दफ़्तर की चिकचिक में पिसता है, और उधर नेताजी देश सेवा के नाम पर अपनी अगली सात पीढ़ियों का इंतज़ाम करने में व्यस्त रहते हैं।
जनसेवा या फ़ायदे का ‘स्टार्टअप’?
आदमी की आवाज़ बनता है। पर आज का नेता आम आदमी के पास सिर्फ़ चुनाव के समय हाथ जोड़ने आता है। चुनाव जीतते ही वह ‘खासमखास’ श्रेणी में प्रमोट हो जाता है।
लेकिन इस खासमखास बनने के खेल में एक बहुत बारीक गणित है।
जब तक आप ‘खास’ के करीबी हैं, तब तक तो आपकी खासमखासियत बरकरार है। जिस दिन बड़े साहब की नज़रों से उतरे, समझो खेल ‘खल्लास’! यानी नेताजी का पूरा जीवन इस डर में बीतता है कि कहीं आज की मलाई कल का पानी न बन जाए।
UCC बाद में, पहले नेताओं का ‘ड्रेस कोड’ लाओ!
आजकल सरकार देश भर में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) लागू करने की बड़ी बातें कर रही है। लेकिन असली ज़रूरत तो संसद और विधानसभाओं में ‘नेताओं के ड्रेस कोड’ की है।
संसद में देखिए—कोई पीले कपड़े पहनकर गरज रहा है, कोई हरे-लाल में दहाड़ रहा है, तो कोई सतरंगी लिबास में अपने सड़े-गले और बदरंग विचारों की उलटी देश की सबसे बड़ी पंचायत में कर रहा है। जनता बेचारी टीवी के सामने बैठकर सोचती है कि उसने अपना प्रतिनिधि चुना है या किसी नौटंकी का जोकर!
जब स्कूलों में बच्चों के लिए, पुलिस वालों के लिए और डॉक्टरों के लिए ड्रेस कोड हो सकता है, तो इन नेताओं के लिए क्यों नहीं? कम से कम एक जैसी ड्रेस में यह तो पता चलेगा कि सब के सब एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं!
‘नेताजी’ तो सिर्फ़ एक थे!
बचपन में जब हम इतिहास पढ़ते थे, तो ‘नेताजी’ शब्द के साथ केवल एक ही नाम ज़हन में आता था—सुभाष चंद्र बोस! जिन्होंने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया। बाकी महान हस्तियों को जनता ने प्यार से ‘बापू’, ‘चाचा’ या ‘लौह पुरुष’ कहा।
लेकिन आज? आज तो गली-मोहल्ले का हर छुटभैया गुंडा, जो चार गाड़ियां खड़ी करके चौराहे पर होर्डिंग लगवा ले, खुद को ‘नेताजी’ कहलवाने लगता है।