अपने ही पाखंड पर पर्दा डालने का एक नया ‘इवेंट’: ‘बाघ बचाओ’
लेख/इवेंट – 31 जुलाई 2026
“बाघ नहीं, जंगल बचाओ। इंसानी भीड़ को रोको, थोड़ा साँस लेने दो।”
अगर प्रकृति के जीवों के पास इंसानी चालाकी और तकनीक आ जाती, तो शायद वे सबसे पहले इंसान से अपनी छीनी हुई ज़मीन और आज़ादी का हिसाब माँगते।
हर साल ‘विश्व बाघ संरक्षण दिवस’ आता है और उसके साथ ही शुरू होता है विज्ञापनों, पोस्टरों और भाषणों का एक भव्य सिलसिला।
चारों तरफ एक ही शोर गूंजता है—”बाघ बचाओ, पर्यावरण बचाओ!” लेकिन ज़रा अपनी तथाकथित सभ्य मानसिकता के चश्मे को उतारकर देखिए: क्या बाघ को सच में हमारे भाषणों और दया की ज़रूरत है? या फिर यह सिर्फ इंसान के अपने ही पाखंड पर पर्दा डालने का एक नया ‘इवेंट’ बन चुका है?
सच तो यह है कि बाघ कभी इंसान के आगे अपनी जान की भीख माँगने नहीं आया था।
हमने अपने विशाल शहरों, हाईवे, फार्महाउस और अंतहीन लालच के लिए उसके सदियों पुराने घर यानी जंगलों को बेरहमी से उजाड़ दिया।
जब हमने उसका घर छीनकर उसे बेघर कर दिया, तो आज वही इंसान सवाल पूछता है कि “बाघ शहरों और बस्तियों में क्यों घुस रहा है?” यह हास्यास्पद तर्क है—बाघ आपके शहर में नहीं आया, आपने उसके घर पर अपना कंक्रीट का जंगल खड़ा कर दिया है।
इंसान की सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि वह खुद को इस पूरी पृथ्वी का ‘मालिक’ समझ बैठा है।
हम 7-स्टार होटलों में वातानुकूलित कमरों में बैठते हैं, सूट-टाई पहनते हैं, काँटे-छुरी से प्लेट में सजा मांस खाते हैं और खुद को बेहद ‘सभ्य’ कहते हैं। हमने अपनी हिंसक प्रवृत्ति को छुपाने के लिए शब्दों के नए जाल बुने हैं—कत्लखाने को ‘प्रोसेसिंग प्लांट’ कह दिया और स्वाद तथा विनाश को ‘लाइफस्टाइल’।
जंगल का शेर तो केवल पेट की भूख मिटाने के लिए शिकार करता है, वह भी तब जब मजबूरी हो। वह कभी स्वाद, व्यापार, संग्रह या अपने अहंकार के लिए शिकार नहीं करता।
लेकिन इंसान? इंसान अपनी जीभ के स्वाद, व्यापार और बेकाबू वासनाओं के लिए पूरी पृथ्वी की हवा, पानी, नदी और जंगलों को निगल रहा है।
बाघ संरक्षण के नाम पर हम जो यह सालाना ‘ड्रामा’ रचते हैं, वह असल में बाघ के प्रति कोई प्रेम नहीं है, बल्कि हमारी अपनी ही गिल्ट (दोषबोध) को छुपाने और खुद की पीठ थपथपाने का ज़रिया है।
अगर इंसान वाकई बाघ को बचाना चाहता है, तो उसे कोई बहुत महान काम करने या बड़े-बड़े इवेंट आयोजित करने की ज़रूरत नहीं है। इंसान बस अपने लिए ज़मीन, हवा, पानी और नीयत को शुद्ध कर ले—बाघ अपने आप बच जाएगा। प्रकृति को हमारी दया या संरक्षण की नहीं, केवल हमारे ‘हस्तक्षेप’ से आज़ादी की दरकार है।
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