डिजिटल डेस्क- 05 नवंबर 2026
(ज्योतिपति और ज्वाला आमने-सामने बैठे हैं। देश के मौजूदा राजनीतिक माहौल पर मीडिया की सुर्खियां देखकर चर्चा शुरू होती है)
स्थान: एक शांत पार्क, जहाँ दोनों चाय की चुस्कियों के साथ समसामयिक मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
ज्योतिपति: (अखबार रखते हुए) आज देश में अजीब सा माहौल चल रहा है, ज्वाला जी। समझ नहीं आता कि इस अराजकता के पीछे कहीं कॉर्पोरेट राजनीति का एकाधिकार यानी मोनोपली की भावना तो नहीं है! राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो पक्ष और विपक्ष दोनों ही सड़क पर नजर आते हैं। पुलिस, किसान, महिला, युवा—सब आंदोलन कर रहे हैं, और फिर भी सत्ता पक्ष द्वारा ‘अराजकता’ की बात कही जा रही है।
ज्वाला: (गंभीर होकर) बिल्कुल, अजीब विरोधाभास है। देश में ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ जैसे नारे गूंज रहे हैं। सवाल यह उठता है कि अराजकता हटाएगा कौन? जिसका राज है, अगर उसी के राज में राजा बेबस दिखे या देश की बागडोर जिसके हाथ में है, वही खुद ‘अराजकता हटाओ’ का नारा दे, तो ऐसा लगता है जैसे कोई राजा है ही नहीं!
ज्योतिपति: सही कहा आपने। हम राजनीति में एक और भाषा सुनते हैं—’सुराज’। अभी जैसे छत्तीसगढ़ में सुराज है और दिल्ली में ‘अराज’ (अराजकता), तो इसका मतलब हुआ कि राज-व्यवस्था ठीक नहीं है। जब व्यवस्था बिगड़ेगी, तो अराजकता तो फैलेगी ही।
ज्वाला: लेकिन राजा का काम तो अराजकता को हटाना है। अगर विपक्ष की जायज आवाज़ को, युवाओं के आंदोलन को सीधे-सीधे ‘अराजकता’ कह दिया जाए, तो यह एक बहुत गलत परिपाटी है। लोकतंत्र को बचाने के लिए ऐसी सोच को बदलना ही होगा। यदि देश के गृहमंत्री या कोई जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति भी इन हालात पर चिंता जताए, तो राष्ट्रपति और देश की व्यवस्था को चौकन्ना होना ही पड़ेगा।
ज्योतिपति: (विचार करते हुए) देखिए, अराजकता का साधारण अर्थ तो यही है कि राजा को जनता की आवाज़ सुनाई न दे या वह जनता की आवाज़ को नजरअंदाज कर दे। 2 से 240 सीटों तक पहुँचने का सफर या चुनावी नतीजे क्या कहते हैं, इस पर मंथन होना चाहिए। वैसे, यहाँ दो शब्दों—’साधारण’ और ‘सामान्य’—के अर्थों को समझना दिलचस्प होगा।
ज्वाला: वो कैसे? जरा समझाइए।
ज्योतिपति: मेरे हिसाब से ‘साधारण’ का मतलब है जिसे सभी धारण कर सकें; जैसे हिंदू धर्म में हिंदू, मुस्लिम धर्म में मुसलमान। और ‘सामान्य’ का अर्थ है जिसे सभी लोग मान लें यानी सर्वमान्य। वहीं, अगर हम ‘अराजकता’ के सामान्य अर्थ की बात करें, तो वह है—सरकारी सत्ता, शासन या कानून-व्यवस्था का अभाव। जब देश में कोई केंद्रीय कानून लागू करने वाला शासक न हो, तो वह स्थिति अराजकता कहलाती है। तो फिर सड़क पर उतरकर आंदोलन करना या प्रदर्शन करना, क्या वह भी व्यवस्था के खिलाफ एक बड़ी अराजकता नहीं बन जाता?
ज्वाला: (बात काटते हुए) यहीं पर शब्दों के गहरे अर्थ छिपे हैं। आइए, इसी संदर्भ में दो और शब्दों को देखें—’जनरंजन’ और ‘मनोरंजन’। जहाँ रंजन हो, रंजो-गम न हो, वही रंजन है। ‘जनरंजन’ का मतलब है जनता के हृदय में खुशी और आनंद पैदा करना, और ‘मनोरंजन’ का अर्थ है मन को प्रफुल्लित करना। मन तो एक उद्यान की तरह है, जहाँ कोमलता और उपजाऊपन होना चाहिए। मन को दर्पण भी कहा गया है, जिसकी अपनी आँखें और अपनी बात होती है।
ज्योतिपति: प्राचीन भारतीय ग्रंथों—जैसे रामायण और महाभारत—के अनुसार भी राजा का मूल कर्तव्य ‘प्रजा का रंजन करना’ यानी प्रजा को खुश रखना, उनका पालन-पोषण करना और उन्हें न्याय देना रहा है।
ज्वाला: बिल्कुल! और जब ‘अराजक’ (अ + राजक) को देखते हैं, तो इसका अर्थ हुआ—एक ऐसा समाज, जहाँ प्रजा का ‘रंजन’ करने वाली या उनकी सुरक्षा करने वाली कोई न्यायपूर्ण व्यवस्था या सत्ता न हो। फिर सवाल यह उठता है कि सत्ताधारी लोग खुद सड़क पर किस हिसाब से प्रदर्शन कर रहे थे?
ज्योतिपति: यह तो सीधे तौर पर विपक्ष की उन बातों को बल देता है, जो कहते हैं कि लोकतंत्र बचाओ और अराजकता हटाओ। यानी जब सत्ता न्यायपूर्ण न रहकर केवल दमनकारी बन जाए, तब ‘अराजक’ का अर्थ केवल “बिना राजा के” नहीं रहता, बल्कि उसका अर्थ होता है—एक ऐसी स्थिति, जहाँ नागरिकों की सुरक्षा, खुशी और न्याय की कोई गारंटी ही न बचे।
ज्वाला: (तेवर में) फिर उस गारंटी को कौन देगा? सत्ता में कौन लोग हैं? शासन किसके हाथ में है? पिछले 12 सालों से राजा कौन है? इसका मतलब तो यही हुआ कि सत्ता की अपनी दी हुई गारंटी खत्म हो गई है! शब्दों के चयन और उनके सूक्ष्म अर्थों पर यह दृष्टिकोण वास्तव में इस पूरी राजनीतिक और दार्शनिक बहस को एक नए स्तर पर ले जाता है।
ज्योतिपति: यही तो मुख्य बात है। जब समाज में यह सुरक्षा और न्याय देने वाली व्यवस्था खत्म हो जाती है, तो हर कोई अपनी मनमर्जी करने लगता है और कानून का शासन समाप्त हो जाता है। इसका मतलब है कि समाज में केवल ‘कंट्रोल’ (शासन) करने वाली व्यवस्था का अभाव नहीं है, बल्कि कल्याण और न्याय करने वाली सहृदय व्यवस्था का अभाव है।
ज्वाला: और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या देश का नागरिक केवल ‘प्रजा’ है? इस व्यवस्था में जनता को केवल टैक्स देने वाली या वोट देने वाली मशीन (‘प्रजा’ या ‘वोटबैंक’) नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि उन्हें आत्मसम्मान से युक्त ‘नागरिक’ माना जाना चाहिए। एक लोकतांत्रिक शासन में आम जनता के साथ-साथ विपक्ष भी उसी प्रजा या नागरिक वर्ग का हिस्सा है।
ज्योतिपति: (निष्कर्ष की मुद्रा में) अंत में सोचने वाली बात यही है कि अगर प्रजा अराजक हो गई है और प्रजातंत्र खुद जनता के विश्वास के काबिल नहीं बचा, तो इसका सीधा मतलब है कि हमारी प्रजातांत्रिक व्यवस्था कहीं न कहीं फेल हो रही है।
