जय विजयादशमी! बुराई पर अच्छाई की विजय हो। 🏹🔥विजयादशमी का संदेश यही है कि सत्ता या ज्ञान का अहंकार चाहे रावण जैसा विशाल क्यों न हो, अंततः सत्य, जनचेतना और राष्ट्रहित की शक्ति ही विजयी होती है।
विजयादशमी विशेष/20 अक्टूबर 2026
दीपक पाण्डेय 9826157101
आज विजयादशमी का पावन पर्व है। यह पर्व असत्य पर सत्य की, और अहंकार पर विवेक की विजय का प्रतीक है। जब हम रावण के चरित्र पर दृष्टि डालते हैं, तो उसके ज्ञान, प्रखरता, पराक्रम और वीरता से इंकार नहीं किया जा सकता।
पौराणिक कथाओं के अनुसार रावण के पास दस सिर यानी दस मस्तिष्क थे। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो एक साधारण मानव मस्तिष्क में लगभग 86 अरब न्यूरॉन्स होते हैं, जो अनगिनत विचार, गणनाएं और भावनाएं पैदा करते हैं।
ज़रा सोचिए, जिसके पास दस मस्तिष्क रहे हों, उसके भीतर विचारों और बौद्धिक क्षमता का कितना बड़ा समंदर रहा होगा! और शायद यही कारण था कि उस अपार ज्ञान और शक्ति के अहंकार में उसने खुद को सबसे सर्वोपरि मान लिया था।
यह इस कहावत को चरितार्थ करता है कि “ब्रेन इज़ द मेन पार्ट ऑफ़ द बॉडी”, लेकिन जब यही मस्तिष्क अहंकार से भर जाए, तो पतन का कारण बन जाता है।
आज विजयादशमी के इस अवसर पर, रावण के उस प्रतीकात्मक अहंकार से लेकर वर्तमान व्यवस्था और राष्ट्र-रूपक तक, यह सोचने का समय है कि आज के तंत्र और लोकतंत्र का असली ‘मस्तिष्क’ और ‘अंकाराक्षस'(वोट) कहाँ और कैसे काम कर रहा है।
मानव शरीर और राष्ट्र की रूपक : देश का मस्तिष्क कौन?
मानव शरीर और राष्ट्र की रूपक के आधार पर, जहाँ समाज या तंत्र की हर आहट और दर्द की प्रतिक्रिया तय होती है, यदि इन तीन संवैधानिक पदों और संस्थाओं को देखा जाए, तो “देश का मस्तिष्क” किसे माना जाए—यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम उस मस्तिष्क की भूमिका ‘निर्णय और नीति निर्माण’ के रूप में देखते हैं या ‘निष्पक्षता और नियम-नियंत्रण’ के रूप में।
संविधान के तहत देश के ये सर्वोच्च पद और संस्थाएं अलग-अलग भूमिकाएं निभाती हैं:
देश का प्रधानमंत्री और कार्यपालिका: “निर्णय लेने वाला मस्तिष्क”


