24.1 C
Raipur
Wednesday, October 21, 2026

बस्तर दशहरा में 600 साल पुरानी मावली परघाव परंपरा का भव्य आयोजन, मां दंतेश्वरी के जयकारों से गूंजा जगदलपुर

Must read

 बस्तर : छत्तीसगढ़ के बस्तर में विश्व प्रसिद्ध दशहरा पर्व के दौरान मावली परघाव की ऐतिहासिक रस्म पूरे विधि-विधान के साथ निभाई गई। मंगलवार देर रात आयोजित इस परंपरा में बस्तर राजपरिवार ने मावली माता का स्वागत किया और मां दंतेश्वरी से देश तथा प्रदेश में सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना की। इस अवसर पर जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर परिसर के कुटरू बाड़ा में दो देवियों का पावन मिलन भी हुआ।इस ऐतिहासिक आयोजन को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु जुटे। मंदिर परिसर से लेकर आसपास की सड़कों तक भक्तों की भारी भीड़ नजर आई। आतिशबाजी, फूल-मालाओं और माता के जयकारों के बीच पूरा क्षेत्र भक्तिमय माहौल में डूब गया। करीब छह शताब्दियों से चली आ रही यह परंपरा बस्तर की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

राजपरिवार ने परंपरागत तरीके से किया मावली माता का स्वागत

दंतेवाड़ा से मावली माता की डोली और छत्र जगदलपुर पहुंचने पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव ने माता का स्वागत किया। श्रद्धालुओं ने फूल-मालाएं अर्पित कर और आतिशबाजी के जरिए अपनी आस्था प्रकट की। इस दौरान छत्तीसगढ़ की खुशहाली और जनकल्याण की कामना की गई।मान्यता है कि बस्तर रियासत के शासक लगभग 600 वर्षों से मावली माता के आगमन पर इस रस्म को विशेष सम्मान और भव्यता के साथ निभाते आ रहे है। इस आयोजन में राजपरिवार के साथ आम श्रद्धालुओं की भागीदारी भी परंपरा को जीवंत बनाए रखती है।

छह सदियों से कायम है मावली परघाव की परंपरा

मावली परघाव की शुरुआत बस्तर के तत्कालीन महाराजा रुद्र प्रताप देव के समय से जुड़ी मानी जाती है। उस दौर में देवी की डोली का भव्य स्वागत किया जाता था। समय के साथ राजशाही व्यवस्था बदल गई, लेकिन देवी के सम्मान से जुड़ी यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।परंपरागत मान्यता के अनुसार, मावली माता का संबंध कर्नाटक के मलवल्य गांव से है। कहा जाता है कि छिंदक नागवंशीय शासकों के शासनकाल में देवी बस्तर पहुंची थीं। छिंदक नागवंश ने नौवीं से 14वीं शताब्दी के बीच इस क्षेत्र पर शासन किया था। इसके बाद चालुक्य शासक अन्नम देव ने बस्तर में अपना राज्य स्थापित किया और मावली देवी को कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया। देवी के प्रति आदर व्यक्त करने और उनका विधिवत स्वागत करने की परंपरा आगे चलकर मावली परघाव के रूप में स्थापित हुई।

नवमी पर डोली का स्वागत, दशहरा समाप्त होने पर होती है विदाई

बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद भंजदेव के अनुसार, परंपरा के तहत नवमी के दिन दंतेवाड़ा से आने वाली मावली माता की डोली का स्वागत किया जाता है। राजा, राजगुरु और पुजारी नंगे पांव राजमहल से मंदिर परिसर तक पहुंचते है। वहां देवी की अगवानी और पूजा-अर्चना के बाद डोली को कंधों पर उठाकर राजमहल स्थित मां दंतेश्वरी मंदिर में लाया जाता है।बस्तर दशहरा संपन्न होने तक माता की डोली राजमहल में विराजमान रहती है। पर्व के समापन के बाद पूरे सम्मान के साथ देवी को विदाई दी जाती है।

पंचमी से शुरू होती है देवी-देवताओं को आमंत्रित करने की प्रक्रिया

कमलचंद भंजदेव ने बताया कि बस्तर दशहरा में देवी-देवताओं की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए पंचमी के दिन दंतेवाड़ा जाकर निमंत्रण देने की परंपरा है। मधोता, बड़े डोंगर, छोटे डोंगर सहित अन्य स्थानों के देवी-देवताओं को भी पर्व में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया जाता है।इसी दिन मंदिर से मावली माता की डोली को सिंह द्वार के पास लाया जाता है। इसके बाद जिया बाबा को डोली लेकर पहुंचने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। पुराने समय में डोली को पैदल ही बस्तर तक लाया जाता था और निशा जात्रा के अवसर पर अष्टमी के दिन इसका आगमन होता था।

दुर्लभ वनफूलों से तैयार होता है कांटाबंद साफा

मावली परघाव की रस्म में राजपरिवार के सदस्यों के सिर पर सजा कांटाबंद साफा भी विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। यह साफा जंगल में मिलने वाले दुर्लभ फूलों से तैयार किया जाता है और इसे बनाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है।कमलचंद भंजदेव के मुताबिक, इस साफे का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इसे नम्रता और सम्मान का प्रतीक माना जाता है। माता की डोली को राजमहल लाने के दौरान इसे धारण किया जाता है।इस वर्ष तिथि दो होने के कारण माता की डोली एक दिन पहले ही पहुंच गई। हालांकि, रस्म के प्रति श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं हुआ। बस्तर दशहरा समाप्त होने तक माता की डोली राजमहल में रहेगी, जिसके बाद परंपरागत विधि से उनकी विदाई की जाएगी।मावली परघाव केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी आस्था, राजपरिवार की परंपरा और स्थानीय समाज की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। यही वजह है कि हर साल इस आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर अपनी परंपरा से जुड़ाव प्रकट करते है।

- Advertisement -spot_img

More articles

- Advertisement -spot_img

Latest article