न्यूज/लेख – 19 अक्टूबर 2026
दीपक पाण्डेय 9826157101
प्रायः व्यवस्था और सत्ता से जुड़े तंत्र यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं कि सड़क पर उतरने वाले युवा भटके हुए, बहकावे में आए हुए या नासमझ हैं। जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि ये वही युवा हैं जो इस देश की प्रगति और अपने भविष्य को लेकर सबसे अधिक चिंतित हैं।
यदि देश के पढ़े-लिखे, जागरूक और वैचारिक रूप से परिपक्व युवा सही दिशा में एकजुट होकर अपनी आवाज़ उठाना जारी रखें, तो राजनीति, नीतियों और शासन के रवैये—तीनों को बदलना देश हित में एक अनिवार्यता बन जाता है।कैसे?!
आज के दौर में जब भी देश के किसी कोने में युवा अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरते हैं, तो सबसे पहला सवाल यही उठाया जाता है कि आंदोलन करने वाले ये युवा कौन हैं? क्या वे अनपढ़ या दिशाहीन भीड़ हैं, अथवा वे समाज के पढ़े-लिखे, जागरूक और बौद्धिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं?
इस प्रश्न पर यदि हम इतिहास समाजिक और वर्तमान ज़मीनी हकीकत के परिप्रेक्ष्य में विचार करें, तो दो मुख्य और बेहद महत्वपूर्ण दृष्टिकोण स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आते हैं।
“सड़क पर संघर्ष करने वाले युवा अनपढ़ नहीं हैं” — आज की यथार्थ स्थिति
यह समाज और व्यवस्था में व्याप्त एक बहुत बड़ा भ्रम या गलतफहमी है कि केवल वही लोग आंदोलनों में शामिल होते हैं जिनके पास शिक्षा नहीं है या जो योग्यता की कमी के कारण असफल रहे हैं। आज के भारत की ज़मीनी सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है:
- उच्च शिक्षित बेरोजगार: वर्तमान में जो युवा सड़कों पर परीक्षाओं में पारदर्शिता, पेपर लीक के विरोध, या रोजगार के अवसरों की मांग को लेकर आवाज़ उठा रहे हैं, उनमें से अधिकांश स्नातक (Graduates), परास्नातक (Post-Graduates), इंजीनियर, डॉक्टर और उच्च तकनीकी डिग्रियां प्राप्त युवा हैं।
- योग्यता और असंतोष का विस्फोट: जब देश के सबसे योग्य और पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद भी उचित अवसर नहीं मिलते, और वे खुद को व्यवस्था के हाथों ठगा हुआ महसूस करते हैं, तो उनका यह असंतोष सड़कों पर प्रकट होता है। यह इस बात का सीधा प्रमाण है कि यह संघर्ष केवल साधनहीनता का नहीं, बल्कि उन मेधावी युवाओं की पीड़ा का है जिनका भविष्य अनिश्चितता के दौर में अटका हुआ है।
“आंदोलन पढ़े-लिखे और अच्छे विचारों वाले लोगों द्वारा ही होना चाहिए” — वैचारिक दृष्टिकोण
यह विचार अपने आप में अत्यधिक महत्वपूर्ण है कि किसी भी लोकतांत्रिक विरोध या आंदोलन को केवल अंधी भीड़ (Mob mentality) या अराजकता का रूप नहीं लेना चाहिए। आंदोलन में एक स्पष्ट वैचारिक दिशा और बौद्धिक परिपक्वता का होना अनिवार्य है:
- बौद्धिक नेतृत्व (Intellectual Leadership): इतिहास इस बात का साक्षी है कि दुनिया के सबसे बड़े, परिवर्तनकारी और सफल आंदोलन—चाहे वह भारत का स्वतंत्रता संग्राम हो या दुनिया के महान सामाजिक सुधार आंदोलन—हमेशा दूरदर्शी, शिक्षित और उच्च विचारों वाले नेतृत्व द्वारा ही आगे बढ़ाए गए। जब किसी आंदोलन में वैचारिक स्पष्टता और नीतिगत तर्क होते हैं, तो वह सत्ता और व्यवस्था को झुकने पर मजबूर कर देता है।
- सड़क और संवाद का संतुलन: जब पढ़े-लिखे, समझदार और नीतिगत समझ रखने वाले लोग अपनी आवाज़ उठाते हैं, तो उनका विरोध केवल एक सीमित ‘हंगामा’ बनकर नहीं रह जाता। वह एक ठोस ‘वैचारिक क्रांति’ का रूप ले लेता है। आज देश को इसी बात की सख्त जरूरत है कि भावनाओं के साथ-साथ तर्कों, आंकड़ों और नीतियों की समझ रखने वाली युवा पीढ़ी राष्ट्र के सामने अपनी बात रखे।


