डिजिटल डेस्क_12/03/2026
छत्तीसगढ़ और उसके सीमावर्ती राज्यों में हाल के दिनों में मवेशी तस्करी की घटनाओं में आई तेजी न केवल कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाती है, बल्कि मानवीय क्रूरता की पराकाष्ठा को भी दर्शाती है। बीजापुर के दुर्गम जंगलों से लेकर पांढुर्णा की सड़कों पर तेज रफ्तार कारों में मवेशियों को ठूंसना यह बताता है कि तस्कर अब बेखौफ हो चुके हैं।
बीजापुर में 171 मवेशियों की बरामदगी और पांढुर्णा में एक छोटी कार (स्विफ्ट) के भीतर 8 मवेशियों को क्रूरतापूर्वक बांधकर ले जाना यह स्पष्ट करता है कि यह केवल छिटपुट अपराध नहीं, बल्कि एक सुनियोजित अंतरराज्यीय संगठित अपराध है। छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति, जहां इसकी सीमाएं महाराष्ट्र, तेलंगाना और ओडिशा जैसे राज्यों से मिलती हैं, तस्करों के लिए एक ‘सेफ पैसेज’ बनती जा रही है।
पांढुर्णा: कार के अंदर मवेशियों की क्रूरता
एक चौंकाने वाले मामले में, पांढुर्णा में तस्करों ने स्विफ्ट कार का इस्तेमाल किया। गौरक्षकों ने संदिग्ध कार का 22 किलोमीटर तक पीछा कर लोधीखेड़ा के पास उसे रोका। कार के भीतर 8 मवेशी अमानवीय तरीके से बांधकर भरे गए थे। हालांकि चालक और तस्कर अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गए, लेकिन पुलिस ने वाहन जब्त कर मवेशियों को गौशाला भेज दिया है।
यहाँ दो मुख्य पहलू विचारणीय हैं:
खुफिया तंत्र और जनभागीदारी: बीजापुर और कबीरधाम की कार्रवाइयों में मुखबिरों और गौ-सेवकों की भूमिका अहम रही है। यह दर्शाता है कि जब तक समाज और पुलिस के बीच तालमेल रहेगा, ऐसे नेटवर्क ध्वस्त होते रहेंगे।
तकनीक और तस्करी का नया तरीका: अब तस्कर केवल ट्रकों का सहारा नहीं ले रहे, बल्कि छोटी कारों और पिकअप वाहनों का उपयोग कर रहे हैं ताकि पुलिस की नजरों से बचा जा सके।
प्रशासन को केवल जब्ती और गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इन तस्करों के ‘फाइनेंशियल बैकबोन’ और उन कत्लखानों तक पहुंचना होगा जहाँ ये मवेशी भेजे जा रहे हैं। यदि समय रहते इन पर नकेल नहीं कसी गई, तो यह समस्या न केवल पशुधन का नुकसान करेगी बल्कि सांप्रदायिक और सामाजिक सद्भाव के लिए भी खतरा बन सकती है।


